माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan

माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 8 समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 7 समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 6 समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 5 समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 4 समर्पण -माखनलाल…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 8

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 8 गीत (२) चरण चलें, ईमान अचल हो! जब बलि रक्त-बिन्दु-निधि माँगे पीछे पलक, शीश कर आगे सौ-सौ युग अँगुली पर जागे चुम्बन सूली को अनुरागे, जय काश्मीर हमारा बल हो, चरण चलें, ईमान अचल हो। स्मरण वरण का हिमगिरि का रथ, तुम्हें पुकार रहा सागर-पथ, अणु से कहो, अमर है निर्भय, बोल मूर्ख, मानवता की जय, झण्डा है नेपाल, सबल हो, चरण चलें, ईमान…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 7

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 7 उधार के सपने बहुत बोल क्या बोलूँ ये सब सपने हैं उधार के राजा। बहुत भले लगते हैं; गहने अपने हैं उधार के राजा! तुझे जोश आता है, देखा; तुझे क्रोध आता है, माना। पर ’हमने’ अपने दाता की हरी पुतलियों को पहिचाना? तू उनका युग-युग का दुश्मन, तू उनकी है आज जरूरत, एक साथ रख देख, सलोने, उनकी सूरत और जरूरत। तब फिर…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 6

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 6 मन की साख मन, मन की न कहीं साख गिर जाये, क्यूँ शिकायत है?-भाई हर मन में जलन है। दृग जलधार को निहारने का रोज़गार-- कैसे करें?-हर पुतली में प्राणधन है। व्यथा कि मिठास का दिवाला कैसे काढ़े उर? कान कहाँ जायें? लगी प्राणों से लगन है। प्यार है दिवाना उसे कुछ भी न पाना वह तेरे द्वार धूनियाँ रमाने में मगन है। (खण्डवा-१९४५)…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 5

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 5 एक तुम हो गगन पर दो सितारे: एक तुम हो, धरा पर दो चरण हैं: एक तुम हो, ‘त्रिवेणी’ दो नदी हैं! एक तुम हो, हिमालय दो शिखर है: एक तुम हो, रहे साक्षी लहरता सिंधु मेरा, कि भारत हो धरा का बिंदु मेरा । कला के जोड़-सी जग-गुत्थियाँ ये, हृदय के होड़-सी दृढ वृत्तियाँ ये, तिरंगे की तरंगों पर चढ़ाते, कि शत-शत ज्वार…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 4

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 4 तुम्हारा मिलन तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई! भूलती-सी जवानी नई हो उठी, भूलती-सी कहानी नई हो उठी, जिस दिवस प्राण में नेह-बंशी बजी, बालपन की रवानी नई हो उठी; कि रसहीन सारे बरस रसभरे हो गये— जब तुम्हारी छटा भा गई। तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई! घनों में मधुर स्वर्ण-रेखा मिली नयन ने नयन रूप देखा, मिली— पुतलियों में डुबा…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 3

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 3  यह बारीक खयाली देखी यह बारीक खयाली देखी? पौधे ने सिर उँचा करके, पत्ते दिये, डालि दी, फूला, और फूलकर, फल बन, पक कर, तरु के सिर चढ़ झूले झूला, तुमने रस की परख बड़ी की रस पर रीझे, रस को पाया, पर फल की मीठी फाँकों में माली की पामाली देखो? यह बारीक खयाली देखी? जब नदियों का प्यार समेटे ज्वार एक सागर…

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समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 2

समर्पण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Poetry Samarpan Part 2 बेटी की बिदा आज बेटी जा रही है, मिलन और वियोग की दुनिया नवीन बसा रही है। मिलन यह जीवन प्रकाश वियोग यह युग का अँधेरा, उभय दिशि कादम्बिनी, अपना अमृत बरसा रही है। यह क्या, कि उस घर में बजे थे, वे तुम्हारे प्रथम पैंजन, यह क्या, कि इस आँगन सुने थे, वे सजीले मृदुल रुनझुन, यह क्या, कि इस वीथी तुम्हारे तोतले…

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