राधा-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

राधा-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar राधा शरण एक तेरे मैं आयी, धरे रहें सब धर्म हरे ! बजा तनिक तू अपनी मुरली, नाचें मेरे मर्म हरे ! नहीं चाहती मैं विनिमय में उन वचनों का वर्म हरे ! तुझको—एक तुझी को—अर्पित राधा के सब कर्म हरे ! यह वृन्दावन, यह वंशीवट, यह यमुना का तीर हरे ! यह तरते ताराम्बर वाला नीला निर्मल नीर हरे ! यह शशिरंजित सितघन-व्यंजित, परिचित, त्रिविध…

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श्रीकृष्ण-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

श्रीकृष्ण-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar श्रीकृष्ण राम भजन कर पाँचजन्य ! तू, वेणु बजा लूँ आज अरे, जो सुनना चाहे सो सुन ले, स्वर ये मेरे भाव भरे— कोई हो, सब धर्म छोड़ तू आ, बस मेरा शरण धरे, डर मत, कौन पाप वह, जिससे मेरे हाथों तू न तरे ?

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मंगलाचरण-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

मंगलाचरण-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar मंगलाचरण धनुर्बाण वा वेणु लो श्याम रूप के संग, मुझ पर चढ़ने से रहा राम ! दूसरा रंग।

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नहुष-जय भारत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Jai Bharat

नहुष-जय भारत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Jai Bharat   नहुष ‘‘नारायण ! नारायण ! साधु नर-साधना, इन्द्र-पद ने भी की उसी की शुभाराधना।’’ गूँज उठी नारद की वीणा स्वर-ग्राम में, पहुँचे विचरते वे वैजयन्ती धाम में। आप इन्द्र को भी त्याग करके स्वपद का, प्राश्चित करना पड़ा था वृत्र-वध का। पृथ्वीपुत्र ने ही तब भार, लिया स्वर्ग का, त्राता हुआ नहुष नरेन्द्र सुर-वर्ग का। था सब प्रबन्ध यथापूर्ण भी वहाँ नया, ढीला…

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जय भारत-जय भारत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Jai Bharat

जय भारत-जय भारत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Jai Bharat जय भारत मनुज-मानस में तरंगित बहु विचारस्रोत, एक आश्रय, राम के पुण्याचरण का पोत। नमो नारायण, नमो नर-प्रवर पौरुष-केतु, नमो भारति देवि, वन्दे व्यास, जय के हेतु !

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नहुष-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

नहुष-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush नहुष ‘‘नारायण ! नारायण ! साधु नर-साधना, इन्द्र-पद ने भी की उसी की शुभाराधना।’’ बोल उठी नारद की वल्लकी गगन में, जा रहे थे घूमने वे गंगातीर वन में । उस स्वर-लहरी में लोट उठा गन्धवाह, चाह की-सी आह उठी किन्तु वन वाह वाह ? चौंक अप्सराएं उठ बैठीं और झूमीं वे, नूपुर बजा के ताल ताल पर घूमीं वे! किन्तु शची विमना, क्या देखती क्या…

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शची-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

शची-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush शची मणिमय बालुका के तट-पट खोल के, क्या क्या कल वाक्य नैश निर्जन बोल के । श्रान्त सुर-सरिता समीर को है भेटती, क्लान्ति दिन की है उसकी भी मेटती । यह रहा मानस तो अमरों के ओक में, गात्र मात्र ही है मोतियों का नरलोक में । पानी चढ़ने से यही चन्द्र-कर चमके । पाकर इसी को रवि-रश्मि-शर दमके । होती है सदैव नयी वृद्धि परमायु…

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मंगलाचरण-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

मंगलाचरण-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush मंगलाचरण क्योंकर हो मेरे मन मानिक की रक्षा ओह! मार्ग के लुटेरे-काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह । किन्तु मैं बढ़ूँगा राम,- लेकर तुम्हारा नाम । रक्खो बस तात, तुम थोड़ी क्षमा, थोड़ा छोह ।

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