सभी तो लड़ते हैं-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

सभी तो लड़ते हैं-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   सभी तो लड़ते हैं लड़ाइयाँ अस्तित्व की व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की इससे उससे हमसे तुमसे शब्द और अशब्द से अर्थ और अनर्थ से तुरीय और सुषुप्ति से आदमी होने के लिए अमर्त्य जीने के लिए। रचनाकाल: २७-०१-१९८०  

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उनको महल-मकानी-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

उनको महल-मकानी-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal उनको महल-मकानी हमको छप्पर-छानी उनको दाम-दुकानी हमको कौड़ी कानी सच है यही कहानी सबकी जानी-मानी रचनाकाल: ११-०१-१९८० / ११-०६-१९९०  

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गाँव की सड़क-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

गाँव की सड़क-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   गाँव की सड़क शहर को जाती है, शहर छोड़कर जब गाँव वापस आती है तब भी गाँव रहता है वही गाँव, काँव-काँव करते कौओं का गाँव। रचनाकाल: १०-०१-१९८०  

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खेल-खेल में उड़ा-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

खेल-खेल में उड़ा-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   खेल-खेल में उड़ा, पहुँचा- फट गया- आकाश में रंगीन गुब्बारा खुशी का। जिसने उड़ाया आकाश में पहुँचाया वह हुआ फिर गरीब बाप का गरीब बेटा- दुःख दर्द का चहेटा। रचनाकाल: १८-१२-१९७९  

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घोड़े का दाना-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

घोड़े का दाना-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   सेठ करोड़ीमल के घोड़े का नौकर है भूरा आरख।– बचई उसका जानी दुश्मन! हाथ जोड़कर, पाँव पकड़कर, आँखों में आँसू झलकाकर, भूख-भूख से व्याकुल होकर, बदहवास लाचार हृदय से, खाने को घोड़े का दाना आध पाव ही बचई ने भूरा से माँगा। लेकिन उसने बेचारे भूखे बचई को, नहीं दिया घोड़े का दाना; दुष्ट उसे धक्का ही देता गया घृणा से! तब बचई…

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समुद्र वह है-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

समुद्र वह है-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   समुद्र वह है जिसका धैर्य छूट गया है दिककाल में रहे-रहे ! समुद्र वह है जिसका मौन टूट गया है, चोट पर चोट सहे-सहे !  

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वह पठार जो जड़ बीहड़ था-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

वह पठार जो जड़ बीहड़ था-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   वह पठार जो जड़ बीहड़ था कटते-कटते ध्वस्त हो गया, धूल हो गया, सिंचते-सिंचते, दूब हो गया, और दूब पर वन के मन के- रंग -रूप के, फूल खिल उठे, वन फूलों से गंध-गंध संसार हो गया।  

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एक खिले फूल से-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

एक खिले फूल से-कविताएँ-केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal   एक खिले फूल से झाड़ी के एक खिले फूल ने नीली पंखुरियों के एक खिले फूल ने आज मुझे काट लिया ओठ से, और मैं अचेत रहा धूप में  

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