गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

  होली-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali  पीपल-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali यह दिल खोल तुम्हारा हँसना-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali  चौपाटी का सूर्यास्त-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali कवि की बरसगाँठ-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali  मैं प्यासा भृंग…

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होली-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

होली-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali बरस-बरस पर आती होली, रंगों का त्यौहार अनूठा चुनरी इधर, उधर पिचकारी, गाल-भाल पर कुमकुम फूटा लाल-लाल बन जाते काले, गोरी सूरत पीली-नीली, मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली, नीले नभ पर बादल काले, हरियाली में सरसों पीली !

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 पीपल-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

पीपल-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali कानन का यह तरूवर पीपल। युग युग से जग में अचल,अटल।। ऊपर विस्तृत,नभ नील,नील नीचे वसुधा में नदी,झील। जामुन,तमाल,इमली,करील जल से ऊपर उठता मृणाल फुनगी पर खिलता खिलता कमल लाल। तिर तिर करते क्रीड़ा मराल।। ऊँचे टीले से वसुधा पर झरती है निर्झरणी झर झर । हो जाती बूँद बूँद झर कर। निर्झर के पास खड़ा पीपल सुनता रहता कलकल-छल छल।। पल्लव हिलते ढलढल-ढलढल,…

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यह दिल खोल तुम्हारा हँसना-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

यह दिल खोल तुम्हारा हँसना-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali प्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा है बोले मधुप फूल की बोली, बोले चाँद समझ लें तारे गा–गाकर मधुगीत प्रीति के, सिंधु किसी के चरण पखारे यह पापी भी क्यों–न तुम्हारा मनमोहम मुख–चंद्र निहारे प्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा है देखा मैंने एक बूँद से ढँका जरा आँखों का कोना थी मन में…

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 चौपाटी का सूर्यास्त-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

चौपाटी का सूर्यास्त-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali चौपाटी: बम्बई का समुद्र-तट यह रंगों का जाल सलोना, यह रंगों का जाल किरण-किरण में फहराता है नयन-नयन में लहराता है चिड़ियों-सा उड़ता आता है यह रंगों का जाल सहज-सरल-सुन्दर रूपों का यह बादल रंगीन कोमल-चंचल झलमल-झलमल यह चल-दल रंगीन लिए शिशिर का कम्पन-सिहरन और शरद का उज्जवल आनन नव बसन्त का मुकुलित कानन उड़ता आता प्रतिपल-प्रतिक्षण यह रूपों का जाल मनोहर,…

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कवि की बरसगाँठ-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

कवि की बरसगाँठ-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali कवि ने अपनी बरस-गाँठ पर यह कविता लिखी उन्तीस वसन्त जवानी के, बचपन की आँखों में बीते झर रहे नयन के निर्झर, पर जीवन घट रीते के रीते बचपन में जिसको देखा था पहचाना उसे जवानी में दुनिया में थी वह बात कहाँ जो पहले सुनी कहानी में कितने अभियान चले मन के तिर-तिर नयनों के पानी में मैं राह खोजता चला…

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 मैं प्यासा भृंग जनम भर का-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

मैं प्यासा भृंग जनम भर का-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali मैं प्यासा भृंग जनम भर का फिर मेरी प्यास बुझाए क्या, दुनिया का प्यार रसम भर का । मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।। चंदा का प्यार चकोरों तक तारों का लोचन कोरों तक पावस की प्रीति क्षणिक सीमित बादल से लेकर भँवरों तक मधु-ऋतु में हृदय लुटाऊँ तो, कलियों का प्यार कसम भर का । मैं प्यासा…

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तारे चमके, तुम भी चमको-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali

तारे चमके, तुम भी चमको-गोपाल सिंह नेपाली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Singh Nepali तारे चमके, तुम भी चमको, अब बीती रात न लौटेगी, लौटी भी तो एक दिन फिर यह, हम दो के साथ न लौटेगी । जब तक नयनों में ज्योति जली, कुछ प्रीत चली कुछ रीत चली, हो जाएँगे जब बंद नयन, नयनों की घात न लौटेगी । मन देकर भी तन दे बैठे, मरने तक जीवन दे बैठे, होगा फिर…

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