माँ गंगे! शुचि ताल तरंगे!-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

माँ गंगे! शुचि ताल तरंगे!-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   माँ गंगे ! शुचि ताल तरंगे ! सौ-सौ बार प्रणाम तुम्हें पाप विनाशिनि! स्वर्ग निवासिनी! वंदन आठों याम तुम्हें कष्ट, ताप सह, गिरि-गह्वर,तम जीवन के अवसाद, कठिनतम नित्य लक्ष्य धर, चरण द्रुतगतिक्रम बढ़े नित्य गंतव्य, न ले दम तेरा दर्शन, शुचि मनभावन जीवन-धन, तेरा नीराचमन तव आराधन, देवाराधन ! तेरा स्पर्श स्वयं तीर्थाटन ! मोक्षदायिनी, अघविनाशिनी !…

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नाटक-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

नाटक-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   घटती रहती हैं घटनाएं होती रहती हैं दुर्घटनाएं मरते और खपते रहते हैं लोग और दुनिया बाल भी बांका नहीं होता किसी का समाचारों का काम है आना और जाना 'अखबार और टीवी यह सब नहीं देगा तो फिर उसे पूछेगा कौन?' यह टिप्पणी होती है उसकी जिसके पाषाण हृदय में नहीं फूटती कभी करुणा, दया व अपनत्व की फुहार.... जिसको…

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बौनाती संस्कृति-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

बौनाती संस्कृति-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   शब्द खोते ही जा रहे हैं अपने अर्थों के अर्थ या आदमी ही चुक गया है इतना कि उसे अब शब्द नहीं बल्कि उनसे मिलने वाली कुछ रिटर्न हिला देती है अपने धर्म और कर्म से लाभ और लोभ की इस अपसंस्कृति में डिगता चला जा रहा है आदमी कागज की चंद नोटों के लिए..... टुच्चे स्वार्थों में बिक जाता…

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यात्राएं-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

यात्राएं-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   यात्राएं तो होती हैं यात्राएं चाहे हों स्वेच्छा से या फिर करनीं पड़ें विवशता में झेलना ही पड़ता है देह, मन व संवेदनाओं को यात्रा के खट्टे-मिट्ठे अनुभवों की शीत व तपन को दो-मुँही मार संग्रहणीय व स्मरणीय बन जातीं हैं यात्राएँ यदि हो जातीं हैं स्थितियां अनुकूल तब वे भौगोलिकता में छोटी हैं या बड़ी नहीं पड़ता फर्क इस बात…

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अनुभव-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

अनुभव-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   अनुभव नाम होता है अपनी गलतियों की पुनरावृति का जिसे प्रत्यक्षतः नहीं स्वीकारना चाहता कोई भी श्रेय वीरता और साहस का बटोरना चाहता है आदमी जब-तब अपने नाम पर...., लेकिन अपनी पराजय व असमर्थता को मढ़ देता है वह ईश्वर, अल्लाह या पीर-पैगंबरों के नाम कि 'ऐसी ही इच्छा थी उनकी' कैसे हो सकता था इससे बाहर ? किंतु किसी अजेय…

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नियति-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

नियति-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   नभ की अनंत ऊंचाइयों पर बादलों के खेत में हरिण शावकों से फुदकते रहते हैं बादलों के रुई के फाहों से बच्चे बन जाते हैं वे कभी कुलांचे भरते हिरन तो कभी तीव्रतर गति से उन पर झपटते हिंसक व्याघ्र कभी-कभी कल्पनाओं के ऐसे उर्वरा खेत, जिनमें रहतीं हैं स्वप्नों व कर्मों की स्वर्णिम लहलहातीं फसलें..... पैंतालीस से पचास हजार फुट…

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मेरी, दादी बड़ी कमाल !-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

मेरी, दादी बड़ी कमाल !-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   बाल चमकते चांदी जैसे चंचल हिरणी जैसी चाल रिमोट चलाती एक हाथ से जपती वह दूजे से माल मेरी, दादी बड़ी कमाल ! फैशन में नानी की नानी पेटू , ज्यूँ वह मालामाल दिन भर मेवे खूब उड़ाती डीलडौल टमाटर लाल मेरी, दादी बड़ी कमाल ! हमको महज खिलौना समझे बसते, टी वी में हैं प्राण नहीं…

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मम्मी ! लाओ गरम पकौड़े!-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

मम्मी ! लाओ गरम पकौड़े!-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh   किट-किट करते दाँत ठंड से हवा मारती कोड़े मम्मी ! लाओ गरम पकोड़े! पहनो कितने वस्त्र ऊन के पड़ते सब हैं थोड़े मम्मी ! लाओ गरम पकोड़े! जीव - जंतु भी गए कहां सब ? चिड़िया, बंदर, घोड़े सर्दी, मार रही ज्यों कोड़े ! फाहों सी है झड़ी बर्फ की, बनी लोमड़ी सिल्ली कांपे जन, बन भीगी…

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