पद-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

पद-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 1 हमहु सब जानति लोक की चालनि, क्यौं इतनौ बतरावति हौ। हमहु सब जानति लोक की चालनि, क्यौं इतनौ बतरावति हौ। हित जामै हमारो बनै सो करौ, सखियाँ तुम मेरी कहावती हौ॥ 'हरिचंद जु' जामै न लाभ कछु, हमै बातनि क्यों बहरावति हौ। सजनी मन हाथ हमारे नहीं, तुम कौन कों का समुझावति हौ॥ 2 ऊधो जू सूधो गहो वह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है। ऊधो जू…

Continue Readingपद-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

मातृभाषा प्रेम-दोहे-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

मातृभाषा प्रेम-दोहे-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन। उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय। निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय। इक भाषा इक…

Continue Readingमातृभाषा प्रेम-दोहे-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अथ मदिरास्तवराज-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अथ मदिरास्तवराज-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra निन्दतो बहुभिलोकैमुखस्वासपरागमुखै: । बल:हीना क्रियाहीनो मूत्रकृतलुण्ठतेक्षितौ ।। पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा यावल्लुंठतिभूतले । उत्थाय च पुन: पीत्वा नरोमुक्तिमवाप्नुयात् ।। (भले ही कुछ लोग इसकी -मदिरा की- निन्दा करते हों किन्तु बहुतों के मुख से निकलने वाली सांस को यह सुवासित करने का कार्य करती है । यह अलग बात है कि यह बल और क्रिया से हीन कर मूत्र से सिंचित धरा पर क्यों न धराशायी कर दे…

Continue Readingअथ मदिरास्तवराज-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अंग्रेज स्तोत्र-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अंग्रेज स्तोत्र-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् । स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।। एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत। भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।। (इससे विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन, स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ…

Continue Readingअंग्रेज स्तोत्र-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

 हरी हुई सब भूमि-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

हरी हुई सब भूमि-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra बरषा सिर पर आ गई हरी हुई सब भूमि बागों में झूले पड़े, रहे भ्रमण-गण झूमि करके याद कुटुंब की फिरे विदेशी लोग बिछड़े प्रीतमवालियों के सिर पर छाया सोग खोल-खोल छाता चले लोग सड़क के बीच कीचड़ में जूते फँसे जैसे अघ में नीच

Continue Reading हरी हुई सब भूमि-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

चने का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

चने का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra चना जोर गरम। चना बनावैं घासी राम। जिनकी झोली में दूकान।। चना चुरमुर-चुरमुर बोलै। बाबू खाने को मुँह खोलै।। चना खावैं तोकी मैना। बोलैं अच्छा बना चबैना।। चना खाएँ गफूरन, मुन्ना। बोलैं और नहिं कुछ सुन्ना।। चना खाते सब बंगाली। जिनकी धोती ढीली-ढाली।। चना खाते मियाँ जुलाहे। दाढ़ी हिलती गाहे-बगाहे।। चना हाकिम सब खा जाते। सब पर दूना टैक्स लगाते।। चना जोर गरम।।

Continue Readingचने का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

चूरन का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

चूरन का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra चूरन अलमबेद का भारी, जिसको खाते कृष्ण मुरारी।। मेरा पाचक है पचलोना, जिसको खाता श्याम सलोना।। चूरन बना मसालेदार, जिसमें खट्टे की बहार।। मेरा चूरन जो कोई खाए, मुझको छोड़ कहीं नहि जाए।। हिंदू चूरन इसका नाम, विलायत पूरन इसका काम।। चूरन जब से हिंद में आया, इसका धन-बल सभी घटाया।। चूरन ऐसा हट्टा-कट्टा, कीन्हा दाँत सभी का खट्टा।। चूरन चला डाल की मंडी, इसको खाएँगी सब…

Continue Readingचूरन का लटका-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

होली-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

होली-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra कैसी होरी खिलाई। आग तन-मन में लगाई॥ पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई। पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई॥ तबौ नहिं हबस बुझाई। भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई। टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई॥ तुम्हें कैसर दोहाई। कर जोरत हौं बिनती करत हूँ छाँड़ो टिकस कन्हाई। आन लगी ऐसे फाग के ऊपर भूखन जान गँवाई॥…

Continue Readingहोली-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra