या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता या मुझे ताज-गदायाना बनाया होता खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे काश, खाके-दरे-जनाना बनाया होता नशा-ए-इश्क का गर जर्फ दिया था मुझको उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता दिले-सदचाक बनाया तो बला से लेकिन जुल्फे-मुश्कीं का तेरे शाना बनाया होता था जलाना ही अगर दूरी-ए-साकी से मुझे तो चरागे-दरे-मयखाना बनाया होता क्यों खिरदमन्द बनाया, न बनाया…

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 थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar थे कल जो अपने घर में वो महमाँ कहाँ हैं जो खो गये हैं या रब वो औसाँ कहाँ हैं आँखों में रोते-रोते नम भी नहीं अब तो थे मौजज़न जो पहले वो तूफ़ाँ कहाँ हैं कुछ और ढब अब तो हमें लोग देखते हैं पहले जो ऐ "ज़फ़र" थे वो इन्साँ कहाँ हैं

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तेरे जिस दिन से ख़ाक-पा हैं हम-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

तेरे जिस दिन से ख़ाक-पा हैं हम-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar तेरे जिस दिन से ख़ाक-पा हैं हम ख़ाक हैं एक कीमिया हैं हम हम-दमो मिसले-सूरते-तस्‍वीर क्‍या कहें तुमसे, बेसदा हैं हम हम हैं जूँ ज़ुल्‍फ़े-आरिज़े-ख़ूबाँ गो परेशाँ है खुशनुमा हैं हम जिस तरफ़ चाहे हम को ले जाए जानते दिल को रहनुमा हैं हम जो कि मुँह पर है, वो ही दिल में है मिसले-आईना बा-सफ़ा हैं हम तू जो नाआशना…

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 रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले हमको शबनम की तरह सब है रुलाने वाले सोजिशे-दिल का नहीं अश्क बुझाने वाले बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले मुंह पे सब जर्दी-ए-रुखसार कहे देती है क्या करें राज मुहब्बत के छिपाने वाले देखिए दाग जिगर पर हों हमारे कितने वह तो इक गुल हैं नया रोज खिलाने वाले दिल को करते है…

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 न तो कुछ कुफ़र है, न दीं कुछ है-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

न तो कुछ कुफ़र है, न दीं कुछ है-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar न तो कुछ कुफ़र है, न दीं कुछ है है अगर कुछ, तेरा यकीं कुछ है है मुहब्बत जो हमनशीं कुछ है और इसके सिवा नहीं कुछ है दैरो-काबा में ढूंडता है क्या देख दिल में कि बस यहीं कुछ है नहीं पसतो-बुलन्द यकसां देख कि फ़लक कुछ है और ज़मीं कुछ है सर-फ़रो है जो बाग़ में नरगिस…

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नसीब अच्छे अगर बुलबुल के होते-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

नसीब अच्छे अगर बुलबुल के होते-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar नसीब अच्छे अगर बुलबुल के होते तो क्या पहलू में कांटे, गुल के होते जो हम लिखते तुम्हारा वसफ़े-गेसू तो मुसतर तार के, सम्बुल के होते जो होता ज़रफ़ साकी हमको मालूम तो मिनतकश न जामे-मुल के होते जताते मसत गर नाज़ुक-दिमाग़ी तो बरहम शोर से कुलकुल के होते लगाते शमा-सी गर लौ न तुझसे तो यूं आख़िर न हम धुल-धुल के…

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न रही ताब-ओ-न तवां बाकी-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

न रही ताब-ओ-न तवां बाकी-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar न रही ताब-ओ-न तवां बाकी है फ़्कत, तन में एक जां बाकी शमा-सा दिल तो जल बुझा लेकिन है अभी दिल में कुछ धुआं बाकी है कहां कोहकन, कहां मजनूं रह गया नामे-आशिकां बाकी ख़ाके-दिल-रफ़तगां पे रखना कदम है अभी सोज़िशे-नेहां बाकी कारख़ाने-हयात से तबे-ज़ार है मगर गरदे-कारवां बाकी दम-ए-उल्फ़त है ज़िन्दगी मेरी वरना है मुझ में वो वहां बाकी

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न किसी की आँख का नूर हूँ-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

न किसी की आँख का नूर हूँ-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्‍त-ए-गुब़ार हूँ मैं नहीं हूँ नग़मा-ए-जाँ-फ़िज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखों की पुकार हूँ मेरा रंग रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया जो चमन…

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