अब तो जीने भी दे यार।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

अब तो जीने भी दे यार।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, डाली - डाली पत्ता तोड़ा कलियों को आहतकर छोड़ा, बागों की लूटी हरियाली क्रूर, अभय लगता वनमाली। करता जाता अत्याचार अब तो जीने भी दे यार। तरुवर जिसको दिया सहारा आया वही सम्भाले आरा, भूला फूलों की सित माला जिससे अबतक था तन पाला। किया वही है पहला वार अब तो जीने भी दे यार। दुनिया का यह…

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हौसला।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

हौसला।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, हौसला टूटे न टूटी जो अगर पतवार है, कश्तियाँ होतीं उन्हीं की मौज के उस पार है। जो अगर हिम्मत ह्रदय में रोक ले तूफान को, लड़खड़ाते भी मगर होती न उनकी हार है। राह की गर्मी न देती है तपन, बेचैनियाँ, मंजिलों की चाह देती थपकियाँ सौ - बार है। हो विकट चाहे सफर या शूल दे धरती- गगन, हौसला ही जिन्दगी…

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चिंता में मत तू जल जाना।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

चिंता में मत तू जल जाना।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, चलता हरदम अंगारों पर शोकाकुल, भय- अम्बारों पर, रुज, पीड़ा के भँवर बीच तू रथ जीवन का रहा खींच तू। खलता वय का यूँ ढल जाना। चिंता में मत तू जल जाना। अनजानी विपदा में रत है कितनी बुरी, भयानक लत है, चेहरे पर रखता तनाव तू मार कुल्हाड़ी रहा पाँव तू। सोच-सोच तन का गल जाना चिंता…

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बच- बचके चल मेरे यार।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

बच- बचके चल मेरे यार।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, यहाँ जिसे अपना जताओगे ठोकर भी उसी से खाओगे, मुस्कुराता, मासूम चेहरा छलेगा यह विष-बेल जहर ही फलेगा, बन्द आँखों से मत कर सफर अपना बनाके तुझे देंगे जहर। पैरों के नीचे सुलगता अंगार बच- बचके चल मेरे यार। ये आशियाँ में आग तक लगा देंगे हँसकर ही तुझे दगा देंगे, मत रोना किसी के सामने कोई नहीं आता…

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मंजिल तेरी राही तू चल।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

मंजिल तेरी राही तू चल।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, खा-खा ठोकर राहों पर चल बाधाओं से राही मत टल, देंगे मंजिल पग के छाले तिमिर बीच प्रस्फुटित उजाले। विघ्न सकल खुद ही जाते जल मंजिल तेरी राही तू चल। कहना नहीं, न होगा काम मिहनत का होता अंजाम, जहाँ हारता घड़ी - घड़ी है आगे उसके जीत खड़ी है। कदम बढ़ाओ निकलेगा हल मंजिल तेरी राही तू चल।…

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सोच में ही आदमी की जीत है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

सोच में ही आदमी की जीत है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, सोच तेरी जीत साथी, सोच तेरी हार है सोच ही करती भँवर के पार है, जिन्दगी तेरी समर, है जीतना अनगिनत बाधा रहे या तम घना। हारने की सोच से तू भीत है सोच में ही आदमी की जीत है। क्या पता किस राह पर अवसर मिले किस दिशा में मंजिलें सत्वर मिलें, बंदकर रखना नहीं निज…

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हार सहज स्वीकार नहीं है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

हार सहज स्वीकार नहीं है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, यह कैसी है घिरी निराशा ? भटक रहा तू दर-दर प्यासा, बाधा अडिग खड़ी पथ होती सागर के तल मिलता मोती। जीवन मृदु - रसधार नहीं है हार सहज स्वीकार नहीं है। विविध रंग में जीवन ढलता शान्त कहीं तो कहीं उबलता, है विचित्र जीवन की धारा तम आता लेकर उजियारा। पथिक गिरा हर बार नहीं है हार सहज…

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पहुँचे बहुत दूर हम चलके ।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

पहुँचे बहुत दूर हम चलके ।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita, भव के पार कई पहचाने जो नूतन थे हुए पुराने, जिन मोड़ों से था रिश्ता अब लगते वही दूर अनजाने। अगणित दीप बुझे हैं जलके पहुँचे बहुत दूर हम चलके । बीते दिन के धुंधले चेहरे रात जगाते हैं भिनसहरे, यादों के सपने लहराते जैसे होते सागर गहरे। भावविभोर करें क्षण कल के पहुँचे बहुत दूर हम चलके…

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