किसान पर मजदूर कविता | Kisan/Krishk Majdoor Poems किसान/कृषक मजदूर कविताएँ

किसान- सोहन लाल द्विवेदी

किसान- सोहन लाल द्विवेदी   ये नभ-चुम्बी प्रासाद-भवन, जिनमें मंडित मोहक कंचन, ये चित्रकला-कौशल-दर्शन, ये सिंह-पौर, तोरन, वन्दन, गृह-टकराते जिनसे विमान, गृह-जिनका सब आतंक मान, सिर झुका समझते धन्य प्राण, ये आन-बान, ये सभी शान, वह तेरी दौलत पर किसान ! वह तेरी मेहनत पर किसान ! वह तेरी हिम्मत पर किसान! वह तेरी ताक़त पर किसान ! ये रंग-महल, ये मान-भवन, ये लीलागृह, ये गृह-उपवन, ये क्रीड़ागृह, अन्तर प्रांगण, रनिवास ख़ास, ये राज-सदन, ये उच्च शिखर पर…

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किसान-कविता नीरज कुमार

किसान-किसान-कविता नीरज कुमार किसान-कविता नीरज कुमार ग़रीब हूँ, गँवार हूँ अनपढ़ हूँ, अंजान हूँ मजबूर हूँ, लाचार हूँ बेचारा हूँ बेसहारा हूँ मेरा सिर्फ़ इतना पाप है मैं भी एक किसान हूँ मेरी कोई आन नहीं मेरा कोई मान नहीं मेरी कोई पहचान नहीं मेरा कोई सम्मान नहीं मेरा बस इतना पाप है मैं स्वाभिमानी हूँ मैं भीख नहीं माँगता मैं हाथ नहीं फैलाता किसी के आगे नहीं गिड़गिड़ाता मैं ज़हर खा लूँ कुएँ में कूद जाऊँ…

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किसान-कविता गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’

किसान-कविता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' किसान मानापमान का नहीं ध्यान, बकते हैं उनको बदज़ुबान, कारिन्दे कलि के कूचवान, दौड़ाते, देते दुख महान, चुप रहते, सहते हैं किसान ।। नजराने देते पेट काट, कारिन्दे लेते लहू चाट, दरबार बीच कह चुके लाट, पर ठोंक-ठोंक अपना लिलाट, रोते दुखड़ा अब भी किसान ।। कितने ही बेढब सूदखोर, लेते हैं हड्डी तक चिंचोर, है मन्त्रसिद्ध मानो अघोर, निर्दय, निर्गुण, निर्मम, कठोर, है जिनके हाथों में किसान ।। जब तक कट मरकर…

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कवि किसान-सुमित्रानंदन पंत

कवि किसान-सुमित्रानंदन पंत कवि किसान जोतो हे कवि, निज प्रतिभा के फल से निष्ठुर मानव अंतर, चिर जीर्ण विगत की खाद डाल जन-भूमि बनाओ सम सुंदर। बोओ, फिर जन मन में बोओ, तुम ज्योति पंख नव बीज अमर, जग जीवन के अंकुर हँस हँस भू को हरीतिमा से दें भर। पृथ्वी से खोद निराओ, कवि, मिथ्या विश्वासों के तृण खर, सींचो अमृतोपम वाणी की धारा से मन, भव हो उर्वर। नव मानवता का स्वर्ण-शस्य- सौन्दर्य लवाओ जन-सुखकर,…

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किसान है क्रोध-गोलेन्द्र पटेल

किसान है क्रोध-गोलेन्द्र पटेल किसान है क्रोध-गोलेन्द्र पटेल निंदा की नज़र तेज है इच्छा के विरुद्ध भिनभिना रही हैं बाज़ार की मक्खियाँ अभिमान की आवाज़ है एक दिन स्पर्द्धा के साथ चरित्र चखती है इमली और इमरती का स्वाद द्वेष के दुकान पर और घृणा के घड़े से पीती है पानी गर्व के गिलास में ईर्ष्या अपने इब्न के लिए लेकर खड़ी है राजनीति का रस प्रतिद्वन्द्विता के पथ पर कुढ़न की खेती का किसान है क्रोध…

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