Poems on Mother in Hindi | कविता माँ पर

माँ-गोलेन्द्र पटेल

माँ-गोलेन्द्र पटेल   ("अनुप्रास अलंकार' में : 'म' से 'माँ") मैं मुख मन्थन मधु! मधुर मंगल मृदुल माँ! महान महन्त मातृत्व महिमा! मुख्य मग मार्गदर्शक महान! मानव मेरी महत्व मान! मुझसे मोह माया मुक्ति! मंजिल मजहब मोहब्बत मस्ती मिलता मनोहर मजेदार ममता! मनुष्य मानो मूझे महकता! मर्म महक मीठी मरहम! माता माई मईया मम! मन-माँझी महाकाव्य महतारी! मत मार्मिक मणि मतारी! महामंत्र मख मठरी माँ! मिट्टी मतलब मेरी माँ! मतभेद मिटाती मेरी माँ! मधुपर्क मधुमय मयुखी मनुजा…

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मुसहरिन माँ-गोलेन्द्र पटेल

मुसहरिन माँ-गोलेन्द्र पटेल   धूप में सूप से धूल फटकारती मुसहरिन माँ को देखते महसूस किया है भूख की भयानक पीड़ा और सूँघा मूसकइल मिट्टी में गेहूँ की गंध जिसमें जिंदगी का स्वाद है चूहा बड़ी मशक्कत से चुराया है (जिसे चुराने के चक्कर में अनेक चूहों को खाना पड़ा जहर) अपने और अपनों के लिए आह! न उसका गेह रहा न गेहूँ अब उसके भूख का क्या होगा? उस माँ का आँसू पूछ रहा है स्वात्मा…

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माँ-कविता श्याम सिंह बिष्ट

माँ-कविता श्याम सिंह बिष्ट मां तेरे आगे निशब्द में कैसे करूं तेरा बखान तुझे कहूं, बहता पावन, गंगाजल या फिर वेद, कुरान तुम ही गुरु, मेरे पहले ज्ञान की तुझसे ही तो माँ मेरी यह पहचान, तुम ही तो हो जननी इस प्रकृति, ब्रह्माण्ड की तेरे समक्ष नतमस्तक ब्रह्मा, विष्णु, महेश व संपूर्ण यह जहान मां रूप तेरे अनगिनत तुम ही परिभाषा प्रेम, त्याग की तुम से ही उपजित शब्द यह बलिदान, मां तेरे आगे निशब्द में…

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माँ-अनिल मिश्र प्रहरी

माँ-अनिल मिश्र प्रहरी माँ ममता की अविरल धारा। स्नेह भरा माँ का आँचल है उर में प्यार भरा निश्छल है, आँखों में करुणा का सागर ममता से भर छलकी गागर। ऋणी तुम्हारा है तन सारा माँ ममता की अविरल धारा। ठोकर जब भी लगी धरा पर अश्रु बिन्दु से नयन गये भर, कदम तुम्हारे बढ़े उठाने ममता की बूँदें बरसाने। तेरी आँखों का मैं तारा माँ ममता की अविरल धारा। खुद जग मुझे सुलाई जननी था अबोध…

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माँ की ममता- अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माँ की ममता- अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’   भूल कर देह-गेह की सब सुधा। माँ रही नेह में सदा माती। जान को वार कर जिलाती है। पालती है पिला-पिला छाती।। देख कर लाल को किलक हँसते। लख ललक बार-बार ललचाई। कौन माँ भर गई न प्यारों से। कौन छाती भला न भर आई॥ माँ कलेजे में बही जैसी कि वह। प्यार की धारा कहाँ वैसी बही। कौन हित-माती हमें ऐसी मिली। दूध से किस की भरी छाती रही।।…

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माता-पिता-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

माता-पिता-अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' उसके ऐसा है नहीं अपनापन में आन। पिता आपही अवनि में हैं अपना उपमान।1। मिले न खोजे भी कहीं खोजा सकल जहान। माता सी ममतामयी पाता पिता समान।2। जो न पालता पिता क्यों पलना सकता पाल। माता के लालन बिना लाल न बनते लाल।3। कौन बरसता खेह पर निशि दिन मेंह-सनेह। बिना पिता पालन किये पलती किस की देह।4। छाती से कढ़ता न क्यों तब बन पय की धार। जब माता उर में उमग…

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माँ के अनगिन रूप- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

माँ के अनगिन रूप- त्रिलोक सिंह ठकुरेला   जग में परिलक्षित होते हैं माँ के अनगिन रूप। माँ जीवन की भोर सुहानी माँ जाड़े की धूप। लाड़-प्यार से माँ बच्चों की झोली भर देती, झाड़-फूंक करके सारी बाधाएँ हर लेती, पा सान्निध्य प्यास मिट जाती माँ वह सुख का कूप । माँ जीवन का मधुर गीत माँ गंगा सी निर्मल, आशाओं के द्वार खोलता माता का आँचल, समय-समय पर ढल जाती माँ बच्चों के अनुरूप। जग में परिलक्षित…

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सुमेरु छंद (माँ)-शुचिता अग्रवाल ‘शुचिसंदीप’

सुमेरु छंद (माँ)-शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'   परम जिस धाम में, हो तुम गयी माँ। सुमन अर्पण तुम्हें, ममतामयी माँ।। पुकारा यूँ लगा, तुमने कहीं से। लगी फिर रोशनी, आती वहीं से।। नहीं दिखती मगर, सूरत तुम्हारी। सजल आँखें तुम्हें, ढूँढ़े हमारी।। हृदय की चोट वो, अब तक हरी है। व्यथित मन हो रहा, आँखें भरी है।। उजाले हैं बहुत, लेकिन डरा हूँ। उदासी है घनी, तम से भरा हूँ।। तुम्हें हर बात की, चिंता सताती। कहाँ कब…

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