Tehzeeb Hafi-NAZM

Tehzeeb Hafi-NAZM

“तुम अकेली नहीं हो सहेली”

तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था
और एक शायर के लफ़्ज़ों को सच मान कर उसकी पूजा मे दिन काटने थें
तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली मे जाँ दे चुका है
तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है
वो तो शायर है
और साफ़ ज़ाहिर है, शायर हवा की हथेली पे लिखी हुई
वो पहेली है जिसने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है
वो तो शायर है, शायर तमन्ना के सेहरा मे रम करने वाला हिरन है
शोब्दा शास सुबहो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है
और ख़ुद अपने ख़्वाबों का गद्दार है
वो तो शायर है, शायर को बस फ़िक्र लोह कलम है, उसे कोई दुख है
किसी का न ग़म है, वो तो शायर है, शायर को क्या ख़ौफ़ मरने से?
शायर तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई
कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समंदर की वो लहर है
जो किनारो से वापस पलटते हुये
मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया
वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया
उसने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में क़सीदी
जिन्हें पढ़के मै काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं
ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं
सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है
और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म

 

“हम मिलेंगे कहीं”

 

हम मिलेंगे कहीं
अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में
एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुये
एक ही जैसे आँसू बहाते हुये
हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुये बोझ की दास्तानों मे खो जायेंगे
हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोये हुये देवताओं की आँखें चभो जायेंगे
हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं मे घिरे पर्वतों पर
बाँझ क़ब्रो मे लेटे हुये कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुये
जो पहाड़ों की औलाद थें, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया
हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स मे हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे
संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुये
आह भरते हुये और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुये हम मिलेंगे
हम मिलेंगे कहीं नारमेंडी के साहिल पे आते हुये अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर
मराकिस से पलटे हुये एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुये
इक जहाँ जंग की चोट खाते हुये हम मिलेंगे
हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखो मे हैरत सजाये हुये, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुये, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों मे मेहमान बन कर मिलेंगे
हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब मे ज़स्ब होने के इमकान में
इक पुरानी इमारत के पहलू मे उजड़े हुये लाँन में
और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान मे
हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिये रास्तों को
हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुये आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुये कालीन पर
हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ मे लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे
और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हमको अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है?
हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत मे, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर मे, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में
कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से खाली पड़ी बेंच पर
जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

 

जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर

 

जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर
इंग्लिश में गुस्सा करती है,

मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं
वो इक ऐसी आग है जिसको सिर्फ़ दहकने से मतलब है
वो एक ऐसा ख़्वाब है जिसको देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है
उसको छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है
वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है
हमने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया
वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है
कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल लेकर ऐसी सतरें खेंचती है,
सबकुछ सीधा हो जाता है
वो चाहे तो हर इक चीज़ को उसके अस्ल में ला सकती है
सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है
हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा
लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं
हर पिंजरे में ऐसे कैदी कब होते हैं
हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं
मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो
महसूस नहीं होने देती
लेकिन अपने होने से उकता जाती है
उसको वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है
वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

 

एक सहेली की नसीहत

 

एक सहेली की नसीहत

तुम अकेली नहीं हो सहेली
जिसे अपने वीरान घर को सजाना था
और एक शायर के लफ़्ज़ों को सच मानकर
उसकी पूजा में दिन काटने थे
तुमसे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब,
झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है
तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो,
तुमसे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है
वो तो शायर है और साफ़ ज़ाहिर है
शायर हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिसने
अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है
वो तो शायर है,
शायर तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है
शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है
अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है
वो तो शायर है
शायर को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है
उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है
वो तो शायर है
शायर को क्या ख़ौफ़ मरने से
शायर तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है
उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है
मैं उसे जानती हूँ, वो समंदर की वो लहर है
जो किनारे से वापस पलटते हुए
मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया
वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया
उसने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी
जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ
और सोचती हूँ कि ये मस’अला दिलबरी का नहीं
ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ
वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं
सहेली तुम मेरी बात मानो
तुम उसे जानती ही नहीं
वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है
और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई
उसी की ही एक नज़्म हो

 

तमाम रात सितारों से बात रहती थी

 

तमाम रात सितारों से बात रहती थी
कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे

वो किस के नक्श उभरते थे तेग़ पर अपनी
वो किस ख़्याल में हम जंग जीत जाते थे
हमे भी क़हत में एक चश्मे-ज़र मयस्सर थी
कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था
भरा हुआ था समंदर इन्हीं ख़जानों से
निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था
वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत
कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था
हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से
हमें ख़्याल का जंगल भी साथ पड़ता था
वो सारे दिन का थका ख़्वाबगाह में आता
थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते
नसीमे-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें
और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते
सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़
वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे
बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं
वो मेरे दिल पर सदा जिसके हाथ रहते थे
वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी
वहाँ भी जा के उसका निशान देख लिया
ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती
हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया
वो अब्र जिसकी तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए
दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है
ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ
कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है
ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब
वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा
मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ
मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा
बदन की बर्फ़ पिघलने के बाद पूछेंगे
बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो
अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर
किसी से पहले मिटी है जो मुझसे कहते हो

 

मुझ पे तेरी तमन्ना का इल्ज़ाम साबित न होता तो सब ठीक था

 

मुझ पे तेरी तमन्ना का इल्ज़ाम साबित न होता तो सब ठीक था
ज़माना तेरी रौशनी के तसलसुल की क़समें उठाता है

और में तेरे साथ रह कर भी तारीखियों
के तनज़ूर में मारा गया
मुझ पे नज़र-ए-करम कर
मुखातिब हो मुझसे
मुझे ये बता मैं तेरा कौन हूँ?
इस ताअल्लुक़ की क्यारी में उगते हुए फूल को नाम दे
मुझ को तेरी मोहब्बत पे शक तो नहीं
पर मेरे नाम से तेरे सीने में रखी हुई ईंट धड़के तो मानो
कब तलक मैं तेरी ख़ामोशी से यूंही अपने मर्ज़ी के मतलब निकालूँगा
मुझ को आवाज़ दे चाहे वो मेरे हक़ में बुरी हो
तेरी आवाज़ सुनने की ख्वाहिश में कानों के परदे खींचे जा रहे हैं
बोलदे कुछ भी जो तेरा जी चाहे.. बोल ना!
तेरे होंठों पे मकड़ी के जालों के जमने का दुःख तो बरहाल मुझ को हमेशा रहेगा
तूने चुपी ही सादनी थी तो इज़हार ही क्यों किया था?
ये तो ऐसे है बचपन में जैसे कहीं खेलते खेलते कोई किसी को ‘स्टेचू’ कहे और फिर उम्र भर उसको मुड़ कर न देखे

 

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