Tehzeeb Hafi-NAZM Part 2

Tehzeeb Hafi-NAZM Part 2

कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए

कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए
एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए

ना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैं?

रौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दीं
कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं

मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माओं ने
रुख़्सत किया था

अपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुए
देखने से बुरा कुछ नहीं है

तेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारी
तेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं है

कुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा था
तो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी है

लेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैं
जिन का हमें इक सदी बा’द फिर सामना है

वबा के दिनों में किसे होश रहता है
किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है

इक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले कर
ये दुनिया नहीं, दायरा खींचना था

ख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलो
और अपनी हिफ़ाज़त करो

कुछ महीने तुम्हें अपने तस्मे नहीं बाँधने
इस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहो

इस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखो

घरों में रहो

 

मरियम

मैं आईनों से गुरेज करते हुए
पहाड़ों की कोख में सांस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूं तो सोचता हूं
की मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम
तुम्हारी बेसाख्ता मोहब्बत जमीं पे फैले हुए समंदर की वो सतो से भी मावरा है
मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज़्र है जो बुरा है मरियम
खला-नवरदो को जो सितारे मुआवजे में मिले थे
वो उनकी रोशनी में ये सोचते हैं
कि वक्त ही तो खुदा है मरियम
और इस ताल्लुक की गठरियो में
रुकी हुई साहतो से हटकर
मेरे लिए और क्या है मरियम
अभी बहुत वक्त है कि हम वक्त दे जरा एक दूसरे को
मगर हम इक साथ रहकर भी ख़ुश न रह सके तो मुआफ करना
कि मैंने बचपन ही दुख की दहलीज पर गुजारा
मैं उन चिरागों का दुख हूं जिनकी लवे शब-ए-इंतजार में बुझ गई
मगर उनसे उठने वाला धुआ ज़मान-ओ-मकान में फैला हुआ है अब तक
मैं कोसारो और उनके जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूं जिनको
जमीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुजर गए हैं
जो लोग दिल से उतर गए हैं
किताबें आंखों पर रख के सोए थे मर गए हैं
मैं उनका दुख हूं
जो जिस्म ख़ुद लज्जित से उकता के आईनों की तसल्लीओ में पले बढ़े हैं
मैं उनका दुख हूं
मैं घर से भागे हुओ का दुख हूं
मैं रात जागे हुओ का दुख हूं
मैं साहिलों से बंधी हुई कश्तियों का दुख हूं
मैं लापता लड़कियों का दुख हूं
खुली हुए खिड़कियों का दुख हूं
मीटी हुई तख्तियां का दुख हूं
थके हुए बादलों का दुख हूं
जले हुए जंगलों का दुख हूं
जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूं
जमीं का दुख हूं
खुदा का दुख हूं
बला का दुख हूं
जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो
जो पिंग बारिश के बाद बन बन के टूटती है वो पिंग तुम हो
तुम्हारे होठों से साहतो ने समाअतो का सबक लिया है
तुम्हारी ही सा के संदली से समुंदरों ने नमक लिया है
तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम
तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम।

 

मेरे जख्म नहीं भरते यारों

 

मेरे जख्म नहीं भरते यारों
मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

मैं तन्हा पेड़ हूं जंगल का
मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं
मैं कौन हूं, क्या हूं, कब की हूं
एक तेरी कब हूं, सबकी हूं
मैं कोयल हूं शहराओ की
मुझे ताब नहीं है छांव की
एक दलदल है तेरे वादों की
मेरे पैर उखड़ते जाते हैं
मेरे जख्म नहीं भरते यारो
मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

मैं किस बच्चे की गुड़िया थी
मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी
मेरे खेलने वाले कहां गए
मुझे चूमने वाले कहां गए
मेरे झुमके गिरवी मत रखना
मेरे कंगन तोड़ ना देना
मैं बंजर होती जाती हूं
कहीं दरिया मोड़ ना देना
कभी मिलना इस पर सोचेंगे
हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे
रास्तों में ही लड़ते जाते हैं
मेरे जख्म नहीं भरते यारों
मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

 

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