Tehzeeb Hafi-NAZM Part 1

Tehzeeb Hafi-NAZM Part 1

मुझे बहुत है के मैं भी शामिल हूँ तेरी जुल्फों की ज़ाइरीनों में,

मुझे बहुत है के मैं भी शामिल हूँ तेरी जुल्फों की ज़ाइरीनों में,
जो अमावस की काली रातों का रिज़्क़ बनने से बच गए,

मुझे कसम है उदास रातों में डसने वाले यतीम साँपों की ज़हर-आलूद ज़िंदगी की,
तेरे छुए जिस्म बिस्तर-ए-मर्ग पर पड़े हैं,
तेरे लबों की ख़फ़ीफ़ जुंबिश से ज़लज़लों ने ज़मीं का ज़ेवर उतार फेंका,
तेरी दरख्शाँ हथेलियों पर बदलते मौसम के जायकों से पता चला है के इस त’अल्लुक़ की सर जमीं पर खीजा बहुत देर तक रहेगी,
मैं जानता हूँ के मैंने ममनू शाहों से हो के ऐसे बहुत से बाबों की सैर की है जहाँ से तू रोकती बहुत थी,
ये हाथ जिनको तेरे बदन की चमक ने बरसो निढ़ाल रक्खा,
हराम है के इन्होंने शाखों से फूल तोड़े हो,
या किसी भी पेड़ के लचकदार बाजुओं से किसी भी मौसम का फ़ल उतारा हो,
और अगर ऐसा हो भी जाता तो फिर भी तेरी शरिष्त में इंतकाम कब है,
अभी मोहब्बत की सुबह रोशन है शाम कब है,
ये दिल के शीशे पर पड़ने वाली मलाल की धूल साफ़ कर दे,
मैं तुझ से छुप कर अगर किसी से मिला तो मुझे मुआफ़ कर दे,

 

“तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझसे”

तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी
डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे
और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर
तू किसी और सितारे से चमक लाई थी
तेरी आवाज़ ही सबकुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ
क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझसे
तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैंने
जीत जायेगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझसे
शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी
ये ताल्लुक मुझे खाता था मगर तू चुप थी
वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है
तुझको पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था
चली आती है यही रस्म कई सदियों से
यही होता है, यही होगा, यही होना था
पूछता रहता था तुझसे कि “बता क्या दुख है?”
और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे
मैने अंदाज़े लगाये के सबब क्या होगा
पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे
जिसका डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से
फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में
जिसके जाने पे मुझे तूने जगह दी दिल में
मेरी क़िस्मत मे ही जब खाली जगह लिखी थी
तुझसे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता
मै वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है
मै वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है
मै वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है
मै वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है
मै वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई
मै तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई
ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है?
तूने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है?
कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से
आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

 

“तारीख़ क्या है”

सुबह रोशन थी और गर्मियों के थका देने वाले दिनों मे सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नेहरों मे गोते लगाते
अपने चेहरे पे कीचड़ लगा कर डराते थें एक दूसरे को
किनारो पे बैठे हुये हमने जो अहद एक दूसरे से लिये थें
उसके धुंधले से नक्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक्श हैं ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार करके हमारी तरफ़ भेजता था
और हम साया-ए-कुफ्र मे एक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थें
उसका चेहरा कभी मेरी आँखो से ओझल नहीं हो सका, उसका चेहरा अगर मेरी आँखो से हटता तो मै काएनात मे फैले हुये
उन मज़ाहिर की तफीम नज़्मों में करता, कि जिस पर बज़िद ने ये बीमार जिन्न को ख़ुद अपनी तमन्नों की आत्माओं ने
इतना डराया के इनको हवस के कफ़स मे मोहब्बत की किरणों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उससे परे हो गये
इनके बस में नहीं कि ये महसूस करते इक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स, जिससे इन्कार कर करके इनके बदन खुरदरे हो गये
एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की इक किस्त को अगले दिन पर नही टाल सकते, ख़ुदा और मोहब्बत पे रायज़नी करते थकते नहीं
और इस पर भी ये चाहते हैं कि मै इनकी मर्जी की नज़्मे कहूँ जिनमें इनकी तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़के हैरान हो
जिसको ये इल्म कहते हैं, उस इल्म की बात हो, फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साय, समाज, अक़ीदा, ज़बान, माशी मशावात, इंसान के रंग-ओ-आदातों अतवार, ईजाद तकलीद, अम्ल इंतशार, नैनन की अज़मद के क़िस्से, खितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुलहनामा लिये तेज़ रफ़्तार, घोड़ों पे सहमे सिपाही, नज़रिया-ए-समावात के काट ने क्या कहा? और उसके जुराबों के फ़ीतों की डिब्बीयाँ, किमीयाँ के ख़जानों का मुँह खोलने वाला बाबल कौन था जिसने पारे को पत्थर में ढाला और हरशल की आँखें जो बस आसमानों पे रहती, क्या वो इग्लेंड का मोसिन नहीं
समंदर की तक्सीर और एटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ क़श्तियो जैसी क्यों हैं? और राफेल के हाथ पर मिट्टी कैसे लगी? ये सवाल
और ये सारी बाते मेरे किस काम की पिछले दस साल से उसकी आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका, और ये पूछते हैं कि हेगल के नज़दीक तारीख़ क्या है?

 

पानी कौन पकड़ सकता है

पानी कौन पकड़ सकता है

जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त’अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में गुस्सा करती है,
मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं

वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है,
वो इक ऐसा फूल है जिसपर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है,
वो इक ऐसा ख़्वाब है जिसको देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है,
उसको छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन
पानी कौन पकड़ सकता है

वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है,
उसको इल्म है किन ख़्वाबों से आंखें नीली पढ़ सकती हैं,
हमने जिनको नफ़रत से मंसूब किया
वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है

कभी-कभी वो अपने हाथ मे पेंसिल लेकर
ऐसी सतरें खींचती है
सब कुछ सीधा हो जाता है

वो चाहे तो हर इक चीज़ को उसके अस्ल में ला सकती है,
सिर्फ़ उसीके हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है,
हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में जिंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है,
हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं
हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है

मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती
लेकिन अपने होने से उकता जाती है,
उसको वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है
वो तो बंद घड़ी भी हाथ मे बांध के कॉलेज आ जाती है

 

सुब्हें रौशन थी और गर्मियों की थका देने वाले दिनों में

 

सुब्हें रौशन थी और गर्मियों की थका देने वाले दिनों में
सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नहरों में गोते लगाते

अपने चेहरों से कीचड़ लगाकर डराते थे एक दूसरे को
किनारों पर बैठे हुए हमने जो अहद एक दूसरे से लिये थे
उसके धुँधले से नक्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक्श है
ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार करके हमारी तरफ़ भेजता था
और हम साया-ए-कुफ़्र में इक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे
उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका
उसका चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनातों में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफ़्हीम नज़्मों में करता
कि जिस पर बज़िद है ये बीमार
जिन को खुद अपनी तमन्नाओं की आत्माओं ने इतना डराया
कि इनको हवस के क़फ़स में मोहब्बत की किरनों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस से परे हो गए
इनके बस में नहीं कि ये महसूस करते एक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स
जिनसे इंकार कर कर के इनके बदन खुरदुरे हो गए
एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की एक क़िस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते
ख़ुदा और मोहब्बत पर राए-ज़नी करते थकते नहीं
और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इनकी मर्ज़ी की नज़्में कहूँ
जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़ के हैरान हो
जिस को ये इल्म कहते है, उस इल्म की बात हो
फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साइंस, समाज, अक़ीदा, ज़बान-ए-म‌आशी, मुसावात,
इंसान के रंग-ओ-आदात-ओ-अतवार ईजाद, तक़लीद, अम्न, इंतिशार, लेनिन की अज़मत के किस्से
फ़ितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुल्ह-नामा लिए तेज़ रफ़्तार घोड़ों पर सहमे सिपाही
नज़िया-ए-समावात में कान में क्या कहा और उसकी जुराबों के फीतों की डिबिया
कीमिया के खज़ानों का मुँह खोलने वाला बाबुल कौन था, जिस ने पारे को पत्थर में ढाला
और हर्शल की आँखे जो बस आसमानों पर रहती,
क्या वो इंग्लैंड का मोहसिन नहीं
समंदर की तस्ख़ीर और अटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ कश्तियों जैसी क्यों है
और राफेल के हाथ पर मट्टी कैसे लगी, क्या ये नीत्शे का मतलब भी निश्ते की तरह नहीं तो नहीं है
ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की
पिछले दस साल से उसकी आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका
और ये पूछते है कि हेगेल के नज़दीक तारीख़ क्या है

 

मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इनस्टॉल कर रहा हूँ

 

मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इनस्टॉल कर रहा हूँ
और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ

मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिये तुम्हें साँसों के सिलिंडर भेजूंगा
जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे
और तुम्हारी देख भाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे
ऑक्सीजन स्टॉक खत्म होने की खबरें गर्दिश भी करे तो क्या
मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊंगा
हस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएं
कुछ लोग तुमसे बिछड़ भी जाएं
तो हौसला मत हारना क्यूंकि
रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती हैं
रंग उतर जाने के लिए होते हैं और जख्म भर जाने के होते हैं

 

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