Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 7

Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 7

उसके हाथों में जो खंजर है ज्यादा तेज है

उसके हाथों में जो खंजर है ज्यादा तेज है
और फिर बचपन से ही उसका निशाना तेज है

जब कभी उस पार जाने का ख्याल आता मुझे
कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है

आज मिलना था बिछड़ जाने की नीयत से हमे
आज भी वो देर से पंहुचा है कितना तेज है

अपना सब कुछ हार के लौट आये हो न मेरे पास
मै तुम्हे केहता भी रहता की दुनिया तेज है

आज उसके गाल चूमे हैं तो अंदाजा हुआ
चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

 

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं
जो देखता हूँ मैं वो भूलता नहीं

किसी मुंडेर पर कोई दिया जिला
फिर इस के बाद क्या हुआ पता नहीं

मैं आ रहा था रास्ते में फूल थे
मैं जा रहा हूँ कोई रोकता नहीं

तेरी तरफ़ चले तो उम्र कट गई
ये और बात रास्ता कटा नहीं

इस अज़दहे की आँख पूछती रही
किसी को ख़ौफ़ आ रहा है या नहीं

मैं इन दिनों हूँ ख़ुद से इतना बे-ख़बर
मैं बुझ चुका हूँ और मुझे पता नहीं

ये इश्क़ भी अजब कि एक शख़्स से
मुझे लगा कि हो गया, हुआ नहीं

 

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा
मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा

अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया
अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा

फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन
मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा

गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ
नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा

मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ
तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा

तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख
मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा

मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने ‘सरवत’ पर
और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा

 

इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ

इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ
ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ

अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ
मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ

आसमाँ और जमीं की वुसअत देख
मैं इधर भी हूँ और उधर भी हूँ

ख़ुद ही मैं ख़ुद को लिख रहा हूँ ख़त
और मैं अपना नामा-बर भी हूँ

दास्ताँ हूँ मैं इक तवील मगर
तू जो सुन ले तो मुख़्तसर भी हूँ

एक फलदार पेड़ हूँ लेकिन
वक़्त आने पे बे-समर भी हूँ

 

अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी

अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी
वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी

वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा
वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी

न जाने कितने परिंदो ने इस में शिरकत की
कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी

हवाओ आओ मिरे गाँव की तरफ देखो
जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी

किसी सिपाह ने ख़ेमे लगा दिये है वहाँ
जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी

गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से
मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी

 

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे
पलट के आए तो सबसे पहले तुझे मिलेंगे।

अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो
हम ऐसे बुजदिल भी पहले सफ में खड़े मिलेगे।

तुझे ये सड़के मेरे तवस्सुत से जानती हैं
तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे।

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