Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 5

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Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 5

अश्क ज़ाएअ’ हो रहे थे देख कर रोता न था

अश्क ज़ाएअ’ हो रहे थे देख कर रोता न था
जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था

सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए
मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था

मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या
मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था

मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं
वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था

प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं
तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था

गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए
मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है

वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है
तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है

मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ
हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है

बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा
आज तो मैं ने उस को इतना देखा है

एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त
तू ने देखा भी है तो क्या देखा है

इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने
दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है

मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा
तुम में से किस किस ने दरिया देखा है

आगे सीधे हाथ पे एक तराई है
मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है

तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा
तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है

चीख़ते हैं दर-ओ-दीवार नहीं होता मैं

चीख़ते हैं दर-ओ-दीवार नहीं होता मैं
आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं

ख़्वाब करना हो सफ़र करना हो या रोना हो
मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता में

अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा
ख़ुद से मिलना हो तो तय्यार नहीं होता मैं

कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए
बस इसी ख़ौफ़ से बीमार नहीं होता मैं

मंज़िल-ए-इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने
हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं

तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे
तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं

लोग कहते हैं मैं बारिश की तरह हूँ ‘हाफ़ी’
अक्सर औक़ात लगातार नहीं होता मैं

जब किसी एक को रिहा किया जाए

जब किसी एक को रिहा किया जाए
सब असीरों से मशवरा किया जाए

रह लिया जाए अपने होने पर
अपने मरने पे हौसला किया जाए

इश्क़ करने में क्या बुराई है
हाँ किया जाए बारहा किया जाए

मेरा इक यार सिंध के उस पार
ना-ख़ुदाओं से राब्ता किया जाए

मेरी नक़लें उतारने लगा है
आईने का बताओ क्या किया जाए

ख़ामुशी से लदा हुआ इक पेड़
इस से चल कर मुकालिमा किया जाए

एक और शख़्स छोड़कर चला गया तो क्या हुआ

एक और शख़्स छोड़कर चला गया तो क्या हुआ
हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ।

अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी
तुम्हारा दुःख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ

मेरे खिलाफ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं
बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

ये किस तरह का ताल्लुक है आपका मेरे साथ

ये किस तरह का ताल्लुक है आपका मेरे साथ
मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ

यही कहीं हमें रस्तों ने बद्दुआ दी थी
मगर मैं भुल गया और कौन था मेरे साथ

वो झांकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है
तुझे यकीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ

सुना है अब वो आँखे किसी और को रो रही है

सुना है अब वो आँखे किसी और को रो रही है
मेरे चस्मो से कोई और पानी भर रहा है

बहुत मजबूर होकर मै तेरी आँखों से निकला
खुसी से कौन अपने मुल्क से बाहर रहा है

गले मिलना न मिला तेरी मर्ज़ी है लेकिन
तेरे चहरे से लगता है तेरा दिल कर रहा है

टूट भी जाऊँ तो तेरा क्या है

टूट भी जाऊँ तो तेरा क्या है
रेत से पूछ आइना क्या है

फिर मेरे सामने उसी का ज़िक्र
आपके साथ मसला क्या है

सब परिंदों से प्यार लूँगा मै
पेड़ का रूप धर लूँगा मै

तू निशाने में आ भी जाये अगर,
कौन सा तीर मार लूँगा मै

आईने आंख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था

आईने आंख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था
एक याद बसर करती थी मुझे मै सांस नहीं ले पाता था

एक शख्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी
रोता था तो रात उजड़ जाती हंसता था तो दिन बन जाता था

मै रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो
मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जाकर वो फोन उठाता था

मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती
मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था

हम एक ज़िंदान में जिंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए
एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था

वो जिस्म नजरअंदाज नहीं हो पाता था इन आंखों से
मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

मुझ से मिलता है पर जिस्म की सरहद पार नहीं करता

मुझ से मिलता है पर जिस्म की सरहद पार नहीं करता
इसका मतलब तू भी मुझसे सच्चा प्यार नहीं करता

दुश्मन अच्छा हो तो जंग में दिल को ठारस रहती है
दुश्मन अच्छा हो तो वो पीछे से वार नहीं करता

रोज तुझे टूटे दिल कम क़ीमत पर लेना पड़ते हैं
इससे अच्छा था तू इश्क़ का कारोबार नहीं करता

यह सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता

यह सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता
मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता

कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है
कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता

यकीन क्यों नहीं आता तुझे मेरे दिल पर
ये फल कहां से तुझे मौसमी नहीं लगता

मैं चाहता हूं वो मेरी जबीं पे बौसा दे
मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता

तेरे ख्याल से आगे भी एक दुनिया है
तेरा ख्याल मुझे सरसरी नहीं लगता

मैं उसके पास किसी काम से नहीं आता
उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता

ये शायरी ये मेरे सीने में दबी हुई आग

ये शायरी ये मेरे सीने में दबी हुई आग
भड़क उठेगी कभी मेरी जमा की हुई आग

मैं छू रहा हूं तेरा जिस्म ख्वाब के अंदर
बुझा रहा हूं मैं तस्वीर में लगी हुई आग

खिजां में दूर रखो माचिसो को जंगल से
दिखाई देती नहीं पेड़ में छुपी हुई आग

मैं काटता हूं अभी तक वही कटे हुए लफ्ज़
मैं तापता हूं अभी तक वही बुझी हुई आग

यही दिया तुझे पहली नजर में भाया था
खरीद लाया मैं तेरी पसंद की हुई आग

एक उम्र से जल बूझ रहा हूं इनके सबब
तेरा बचा हुआ पानी तेरी बची हुई आग

रात को दीप की लो कम नहीं रखी जाती

रात को दीप की लो कम नहीं रखी जाती
धुंध में रोशनी मध्यम नहीं रखी जाती

कैसे दरिया की हिफाजत तेरे जिम्मे ठहराऊ
तुझ से इक आंख अगर नम नहीं रखी जाती

इसलिए छोड़कर जाने लगे सब चारागरा
जख्म से इज्जते मरहम नहीं रखी जाति

ऐसे कैसे मैं तुझे चाहने लग जाऊं भला
घर की बुनियाद तो यकदम नहीं रखी जाती

गलत निकले सब अंदाजे हमारे

गलत निकले सब अंदाजे हमारे
की दिन आये नही अच्छे हमारे

सफर से बाज रहने को कहा हैं
किसी ने खोल के तस्मै हमारे

हर एक मौसम बहोत अंदर तक आया
खुले रहते थे दरवाजे हमारे

उस अब्र-ए-मेहरबा से क्या शिकायत
अगर बर्तन नहीं भरते हमारे

अगर हम पर यक़ीन आता नहीं तो
कहीं लगवा लो अंगूठे हमारे

जख्मों ने मुझ में दरवाजे खोले हैं

जख्मों ने मुझ में दरवाजे खोले हैं
मैंने वक्त से पहले टांके खोलें हैं

बाहर आने की भी सकत नहीं हम में
तूने किस मौसम में पिंजरे खोले हैं

कौन हमारी प्यास पे डाका डाल गया
किस ने मस्कीजो के तसमे खोले हैं

यूं तो मुझको कितने खत मोसुल हुए
एक दो ऐसे थे जो दिल से खोलें हैं

ये मेरा पहला रमजान था उसके बगैर
मत पूछो किस मुंह से रोज़े खोलें हैं

वरना धूप का पर्वत किस से कटता था
उसने छतरी खोल के रास्ते खोले हैं

तिलिस्म-ए-यार ये पहलू निकाल लेता है

तिलिस्म-ए-यार ये पहलू निकाल लेता है
कि पत्थरों से भी खुशबू निकाल लेता है

है बे-लिहाज़ कुछ ऐसा की आँख लगते ही
वो सर के नीचे से बाजू निकाल लेता है

कोई गली तेरे मफरूर-ए-दो-जहाँ की तरफ
नहीं निकलती मगर तू निकाल लेता है

खुदा बचाये वो कज़ाक शहर में आया
हो जेब खाली तो आंसू निकाल लेता है

अगर कभी उसे जंगल में शाम हो जाये
तो अपनी जेब से जुगनू निकाल लेता है

 

तुमने तो बस दिया जलाना होता है

तुमने तो बस दिया जलाना होता है
हमने तो कितनी दूर से आना होता है

आंसू और दुआ में कोई फर्क नहीं
और रो देना भी हाथ उठाना होता है

मेरे साथ परिन्दों कुछ इंसान भी हैं
मैंने अपने घर भी जाना होता है

तुम अब उन रास्तों पर हो तहज़ीब जहाँ
मुड़कर तकने पर जुर्माना होता है

 

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