Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 4

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Tehzeeb Hafi-Ghazals Part 4

 

शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा

 

शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा
ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा

सारी उम्र इसी ख़्वाहिश में गुज़री है
दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा

तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी हैं
मेरे मुँह में जो आएगा बोलूँगा

रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ
मेरा क्या है मैं दिन में भी सो लूँगा

तुम को दिल की बात बतानी है लेकिन
आँखें बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा

 

दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए

 

दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए
जो अभी तक न हो सका हो जाए

तुझ में ये ऐब है कि ख़ूबी है
जो तुझे देख ले तिरा हो जाए

ख़ुद को ऐसी जगह छुपाया है
कोई ढूँढे तो लापता हो जाए

मैं तुझे छोड़ कर चला जाऊँ
साया दीवार से जुदा हो जाए

बस वो इतना कहे मुझे तुम से
और फिर कॉल मुंक़ता’ हो जाए

दिल भी कैसा दरख़्त है ‘हाफ़ी’
जो तिरी याद से हरा हो जाए

 

सो रहेंगे के जागते रहेंगे

 

सो रहेंगे के जागते रहेंगे
हम तेरे ख्वाब देखते रहेंगे

तू कही और ही ढूंढता रहेंगा
हम कही और ही खिले रहेंगे

राहगीरों ने राह बदलनी है
पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे

सभी मौसम है दस्तरस में तेरी
तूने चाहा तो हम हरे रहेंगे

लौटना कब है तूने पर तुझको
आदतन ही पुकारते रहेंगे

तुझको पाने में मसअला ये है
तुझको खोने के वस्वसे रहेंगे

तू इधर देख मुझसे बाते कर
यार चश्मे तो फूटते रहेंगे

एक मुद्दत हुई है तुझसे मिले
तू तो कहता था राब्ते रहेंगे

 

जाने वाले से राब्ता रह जाए

 

जाने वाले से राब्ता रह जाए
घर की दीवार पर दिया रह जाए

इक नज़र जो भी देख ले तुझ को
वो तिरे ख़्वाब देखता रह जाए

इतनी गिर्हें लगी हैं इस दिल पर
कोई खोले तो खोलता रह जाए

कोई कमरे में आग तापता हो
कोई बारिश में भीगता रह जाए

नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाए
ख़्वाब ऐसा कि मुँह खुला रह जाए

झील सैफ़-उल-मुलूक पर जाऊँ
और कमरे में कैमरा रह जाए

 

जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो

 

जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो
लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो

अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं
तू आ चुका हो और तेरा इंतज़ार हो

मै फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यों नही हूँ
तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो

एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर
‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

कब तक किसी से कोई मोहब्बत से पेश आएं
उसको मेरे रवय्ये पर दुख है तो यार हो

 

क्या खबर उस रौशनी में और क्या क्या रोशन हुआ

 

क्या खबर उस रौशनी में और क्या क्या रोशन हुआ
जब वो इन हाथों से पहली बार रोशन रोशन हुआ

वो मेरे सीने से लग कर जिसको रोइ वो कौन था
किसके बुझने पर आज मै उसकी जगह रोशन हुआ

तेरे अपने तेरी किरणो को तरसते हैं यहाँ
तू ये किन गलियों में किन लोगो में जा रोशन हुआ

अब उस ज़ालिम से इस कसरत से तौफे आ रहे हैं
की हम घर में नई अलमारियां बनवा रहे हैं

हमे मिलना तो इन आवादियों से दूर मिलना
उसे कहना गए वक्तों में हम दरिया रहे हैं

बिछड़ जाने का सोचा तो नहीं था हमने लेकिन
तुझे खुश रखने की कोसिस में दुःख पंहुचा रहे हैं

 

तुझे भी अपने साथ रखता और उसे भी अपना दीवाना बना लेता

 

तुझे भी अपने साथ रखता और उसे भी अपना दीवाना बना लेता
अगर मैं चाहता तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता

मैं अपने ख्वाब पूरे कर के खुश हूँ पर ये पछतावा नही जाता
के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था तुझे अपना बना लेता

अकेला आदमी हूँ और अचानक आये हो, जो कुछ था हाजिर है
अगर तुम आने से पहले बता देते तो कुछ अच्छा बना लेता

 

नहीं आता किसी पर दिल हमारा

 

नहीं आता किसी पर दिल हमारा
वही कश्ती वही साहिल हमारा

तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम
तेरी गालियां है मुस्तकबिल हमारा

कभी मिलता था कोई होटलों में हमें
कभी भरता तो कोई बिल हमारा

 

शैतान के दिल पर चलता हूं सीनों में सफर करता हूं

 

शैतान के दिल पर चलता हूं सीनों में सफर करता हूं
उस आंख का क्या बचता है मै जिस आंख में घर करता हूं

जो मुझ में उतरे हैं उनको मेरी लहरों का अंदाजा है
दरियाओ में उठता बैठता हूं सैलाब बसर करता हूं

मेरी तन्हाई का बोझ तुम्हारी बिनाई ले डूबेगा
मुझे इतना करीब से मत देखो आंखों पर असर करता हूं

 

पायल कभी पहने कभी कंगन उसे कहना

 

पायल कभी पहने कभी कंगन उसे कहना
ले आए मुहब्बत में नयापन उसे कहना

मैकश कभी आंखों के भरोसे नही रहते
शबनम कभी भरती नही बर्तन उसे कहना

घरभार भुला देती है दरिया की मुहब्बत
कश्ती में गुजार आया हुं जीवन उसे कहना

एक शब से ज्यादा नही दुनिया की मसेरी
एक शब से ज्यादा नही दुल्हन उसे कहना

रह रह के दहक उठती है ये आतिश-ए-वहशत
दीवाने है सेहराओ का ईधन उसे कहना।

 

मेरी आंख से तेरा गम छलक तो नहीं गया

 

मेरी आंख से तेरा गम छलक तो नहीं गया
तुझे ढूंढ कर कहीं मैं भटक तो नहीं गया

यह जो इतने प्यार से देखता है तू आजकल
मेरे दोस्त तू कहीं मुझसे थक तो नहीं गया

तेरी बद्दुआ का असर हुआ भी तो फायदा
मेरे मांद पड़ने से तू चमक तो नहीं गया

बड़ा पुरफरेब है शहदो शिर का ज़ायका
मगर इन लबों से तेरा नमक तो नहीं गया

तेरे जिस्म से मेरी गुफ्तगू रही रात भर
कहीं मैं नशे में ज्यादा बक तो नहीं गया

 

कब पानी गिरने से खुशबू फूटी है

 

कब पानी गिरने से खुशबू फूटी है
मिट्टी को भी इल्म है बारिश झूठी है

एक रिश्ते को लापरवाही ले डूबी
एक रस्सी ढीली पड़ने पर टूटी है

हाथ मिलाने पर भी उस पे खुला नहीं
ये उंगली पर जख्म है या अंगूठी है

उसका हँसना नामुमकिन था यूं समझो
सीमेंट की दीवार से कोपल फूटी है

नूह से पूछो पीछे रह जाने वालों
कश्ती छूटी है के दुनिया छूटी है

हमने इन पर शेर नहीं लिक्खे हाफी
हमने इन पेड़ों की इज्जत लूटी है

यूं लगता है दिन-ओ-दुनिया छूट गए
मुझ से तेरे शहर की बस क्या छूटी है

 

हां ये सच है कि मोहब्बत नहीं की

 

हां ये सच है कि मोहब्बत नहीं की
दोस्त बस मेरी तबीयत नहीं की

इसलिए गांव मैं सैलाब आया
हमने दरियाओ की इज्जत नहीं की

जिस्म तक उसने मुझे सौंप दिया
दिल ने इस पर भी कनायत नहीं की

मेरे एजाज़ में रखी गई थी
मैने जिस बज़्म में शिरकत नहीं की

याद भी याद से रखा उसको
भूल जाने में भी गफलत नहीं की

उसको देखा था अजब हालत में
फिर कभी उसकी हिफाज़त नहीं की

हम अगर फतह हुए है तो क्या
इश्क ने किस पे हकूमत नहीं की

 

महीनों बाद दफ्तर आ रहे हैं

 

महीनों बाद दफ्तर आ रहे हैं
हम एक सदमे से बाहर आ रहे हैं

तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं
अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं

कहां सोया है चौकीदार मेरा
ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं

समंदर कर चुका तस्लीम हमको
खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं

यही एक दिन बचा था देखने को
उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

 

मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है?

 

मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है?
तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है?

हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं
और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है?

मेरे पहलू से उठ के गया कौन है?
तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है?

ऐसा कोई गुनाह भी मैंने नहीं किया
अब तक हैं आप मुझसे खफ़ा, आप कौन हैं?

मैं उसके साथ-साथ रहा और खुश रहा
फ़िर उसने मुझसे पूछ लिया आप कौन हैं?

तूने जाते हुए ये बताया नहींं
मैं तेरा कौन हूं तू मेरा कौन है

खुद पर जब इश्क़ की वहशत को मुसल्लत करूंगा

 

खुद पर जब इश्क़ की वहशत को मुसल्लत करूंगा
इस कदर ख़ाक उड़ाऊंगा कयामत करूंगा

हिज्र की रात मेरी जान को आई हुई है
बच गया तो मै मोहब्बत की मज़म्मत करूंगा

अब तेरे राज संभाले नहीं जाते मुझसे
मैं किसी रोज़ अमानत में ख़यानत करूंगा

लयलातुल क़दर गुजरेंगे किसी जंगल में
नूर बरसेगा दरख्तों की इमामत करूंगा

 

कैसे उसने ये सब कुछ मुझसे छुपकर बदला

 

कैसे उसने ये सब कुछ मुझसे छुपकर बदला
चेहरा बदला रस्ता बदला बाद में घर बदला

मैं उसके बारे में ये कहता था लोगों से
मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला

वो भी ख़ुश था उसने दिल देकर दिल माँगा है
मैं भी खुश हूँ मैंने पत्थर से पत्थर बदला

मैंने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे
और फिर उसने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

 

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