ज़िन्दां से एक ख़त-नाज़िम हिकमत रन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazim Hikmet Ran(अनुवाद : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) 

ज़िन्दां से एक ख़त-नाज़िम हिकमत रन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazim Hikmet Ran(अनुवाद : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

मेरी जां तुझको बतलाऊं बहुत नाज़ुक येह नुक़्ता है
बदल जात है इंसां जब मकां उसका बदलता है
मुझे ज़िन्दां में प्यार आने लगा है अपने ख़्वाबों पर
जो शब को नींद अपने मेहरबां हाथों से
वा करती है दर उसका
तो आ गिरती है हर दीवार उसकी मेरे कदमों पर
मैं ऐसे ग़रक हो जाता हूं इस दम अपने ख़्वाबों में
कि जैसे इक किरन ठहरे हुए पानी पे गिरती है
मैं इन लमहों में कितना सरख़ुश-ओ-दिलशाद फिरता हूं
जहां की जगमगाती वुसअतों में किस कदर आज़ाद फिरता हूं
जहां दर्द-ओ-अलम का नाम है कोई न ज़िन्दां है
“तो फिर बेदार होना किस कदर तुम पर गरां होगा”
नहीं ऐसा नहीं है मेरी जां मेरा येह किस्सा है
मैं अपने अज़म-ओ-हिम्मत से
वही कुछ बख़शता हू नींद को जो उसका हिस्सा है

 

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