ज़ालिम का दीन किस-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

ज़ालिम का दीन किस-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

ज़ालिम का दीन किस लिए करने लगा कबूल ।
तबदीलिए मज़हब से नहीं कुछ भी है हसूल ।
तौहीद के सिवा हैं येह बातें ही सब फ़ज़ूल ।
मनवाने वाहगुरू को ही आए थे सब रसूल ।
कुछ बुत-प्रसत भी नहीं हैं, बुत-शिकन हैं हम ।
अंमृत छका है जब से नेहायत मग़न हैं हम ।

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