ग़ज़ल-लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला-भारत अंगारा मानु-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharat Angara Manu 

ग़ज़ल-लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला-भारत अंगारा मानु-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharat Angara Manu

लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला
कोई क़तरा आँख से बेसबब निकला ।

दूर तक नज़रों के हिस्से सूनापन
जाने वो इस रास्ते से कब निकला ।

हर कोई चेहरा तेरा चेहरा मिला
अपना चेहरा ढूँढने जब जब निकला ।

कोशिशें नाकाम तो होती रहीं
हौसला फिर भी मगर बेहद निकला ।

बेवज़ह बरसों रहा वो बोलता
चुप हुआ तो दिल में जो था सब निकला ।

जाते जाते मुड़कर मुझको देखना
उसका हर अंदाज़ बेमतलब निकला ।

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