ग़ज़लें व कविता-यशु जान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Yashu Jaan Poetry Part 1

ग़ज़लें व कविता-यशु जान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Yashu Jaan Poetry Part 1

एक बीमारी

एक बीमारी थी मुझे तेरी तस्वीर देख मुस्कुराने की,
अब एक और लग गई है तेरे बिन नींद ना आने की

ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तेरे धोख़े याद करकर,
होश दिल-दिमाग़ ने भुला दी है पीने-खाने की

कि हर बार रहा हूँ ज़िंदा मौत के करीब रह कर,
पर कोशिश तो बड़ी की थी मैंने मर जाने की

और मैं क्यों रहूँ परेशान जुदाई तेरी यूं सहकर,
अब मैं भी चलूँगा चाल तुझपे सितम ढाने की

तेरी याद धोख़े के सिवा है मेरी ज़िंदगी में क्या,
कोई परवाह ही नहीं है यशु अब जान जाने की

काश मौत की भी

काश मौत की भी कोई ज़िन्दग़ी होती,
उसका भी कोई मरता वो रोती होती

उसे भी पता चलता किसी के दर्द का,
आँसुओं से मुँह अपना धोती होती

कंधा देना पड़ता उसे किसी अपने को,
रोज़ किसी अपने की लाश ढोती होती

सिर्फ़ इतना नहीं उसे कोई धोख़ा देता,
हर बार उसकी याद में मरती-खोती होती

उसके साथ वो सब होता जो हुआ सबके साथ,
भीख़ यशु जान से मांगती जागती-सोती

खूंखार

बचलो मैं इस तरह से तैयार हो गया हूँ,
हर सरकार के लिए खूंखार हो गया हूँ

मेरी जनता को बेवकूफ़ मत बनाओ,
मैं चलता फिरता अंगार हो गया हूँ

झूठी कहानियां घड़नी छोड़ दो अब,
मौत के फ़रिश्ते पर सवार हो गया हूँ

संविधान के साथ छेड़छाड़ की अगर,
सोच लेना हदों से पार हो गया हूँ

धर्मों के नाम पर भी लड़ा ना सकोगे,
मुस्लिम,हिन्दू,सीख,जाट चमार हो गया हूँ

यशु जान अकेला नहीं जनता साथ है उसकी
एक-एक के लिए मैं अब चार हो गया हूँ

ग़ुनाह

मुझे कई बार लगता है कि मैं गुनाह कर रहा हूँ,
जो अपनी ही ग़ज़ल को पढ़के वाह-वाह कर रहा हूँ

मांगता हूँ वही जो मुकद्दर में है नहीं मेरे फिर भी,
मैं जानबूझकर क्यों उसीकी चाह कर रहा हूँ

और जला दिया है मैंने अपने सारे रिश्तों को तभी,
अब मैं देखकर भी मौत को ना आह कर रहा हूँ

ज़िन्दगी जल्लाद जैसी बन गई है लगे इस तरह,
ना किसी के दर्द की ही अब मैं परवाह कर रहा हूँ

कि जिस दिन से रूठे हैं वो यशु जान से शायर,
साथ अपने मैं दो और दिलों को तबाह कर रहा हूँ

तूफ़ान

मेरी ज़िंदग़ी में एक दिन ऐसा तूफ़ान आया,
अपने कफ़न में लेकर वो मेरी जान आया

बोला कि तेरा वक़्त ही ठहर गया है यहां,
तू समझ ये तेरी मौत का है सामान आया

कट रही थी दुःख-दर्दों में जो मुश्किल घड़ी,
नामुराद ज़िन्दग़ी को करने आसान आया

हर तरफ़ देख खामोशियों का ही माहौल है,
लग रहा है मेरे घर में रहने शमशान आया

यशु कुछ सोच ले कोई काम जो अधूरा पड़ा,
ले तुझे आज ख़ुदा का आख़री पैग़ाम आया

तेरे ग़म चले आये

ये क्या हुआ जो मेरे रास्ते में तेरे ग़म चले आये,
मुश्किल में तो तुम थे और खींचे हम चले आये

लाख़ कोशिशें की रोकने की अपने आपको मगर,
कुछ ना हुआ बस तेरी ओर मेरे कदम चले आये

सोचता हूँ कि प्यार था अगर तो दूर क्यों हुए थे,
जो बरसों पुरानी दी हुई तोड़ हम कसम चले आये

और तेरे लफ़्ज़ों ने लगाईं थी मेरे ऊपर जो बंदिशें,
उन बंदिशों के फांसलों को करके ख़तम चले आये

अब दूर मत करना ये सोचकर यशु जान को खुद से,
कि दिन-रात दिए जो तूने सहकर सितम चले आये

भगवान्

भगवान् तू मुझे ज़िंदा इस संसार में लाया है,
और मैंने तेरा किया ही तुझको लौटाया है

मुझमें जान फूंकी तूने और अब देख तू,
मैंने तुझे एक पत्थर के रूप में सजाया है

तू देख तो रहा होगा तेरे इंसानो ने ही,
तेरी पूजा पद्धति को रोज़गार बनाया है

धर्मों में बंट कर सारे संसार ने भगवंत,
इंसानियत के सच को अंदर दफ़नाया है

यशु को इस जहान में भेज दिया क्यों,
ग़ुनाहों के सिवा मैंने और क्या कमाया है

मुश्किल में इंसान

मुश्किल में इंसान बहुत कुछ कर जाता है,
डर जाता है मगर बहुत कुछ कर जाता है

सामना हो जब भी सांप का नेवले से,
डट के लड़ता है ना लौटकर घर जाता है

किसी को घेरले घनघोर अंधेरा दिन में,
रौशनी की किरन देख मन में हौंसला भर जाता है

हारता देख सेना को एक जानवर भी,
युद्ध में लाख़ सीने पे वार जर जाता है

पतंगा शान से जीता है चाहे दो घंटे ही,
धूम मचाता यशु खूब चाहे मर जाता है

ये मेरी ज़िद है

पहले मेरी तमन्ना थी तुझे दिल से निकालने की,
अब ज़िद बन चुकी है वो तुझे मार डालने की

क्या कमी थी मेरे प्यार में जो इस तरह से छोड़ा,
ज़रूरत क्यों पड़ गई तुझे मेरी इज़्ज़त उछालने की

मेरी पीठ पीछे वार नहीं सुन क़तल किए हैं तूने,
बड़ी कोशिशें कर चुके हैं दिल को भी संभालने की

माफ़ी की कोई गुंजाइश भी बाक़ी नहीं है सनम,
हमने सीख ली है तरकीब टूटे दिल को पालने की

मेरे आंसुओं का सागर तुझको ले डूबेगा यार,
हिम्मत भी की अगर यशु की बात टालने की

राजनीति दलदल है

राजनीति दलदल है घुसते ही जाओगे,
मीठा लड्डू देखकर रह ना पाओगे

झूठ बोलने की लत सी लग जाएगी,
रख कर पैर इसमें तुम पछताओगे

चाँदनी चार दिन की दो दिन की लगेगी,
हर दिन हर रात सोच घबराओगे

सांस ना लेने देगा जनता का रुतबा,
बेईमानी कहलायेगा जो भी कमाओगे

धोखे की ज़िंदगी को धोखे में रखकर,
धोखा किया है यशु धोखा ही खाओगे

राम-राम करते

राम-राम करते मेरा,
तन ही हुआ राम,
बोलो क्या करूँ,
मन,आँखों में राम मेरे,
राम चारों धाम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

मैं नाचूँ दीवानी होकर,
मात-पिता सब राम,
राम भक्ति मेरी शक्ति,
जप्ती सुबह-शाम,
राम संग सीता लक्ष्मण,
हनुमान जी प्रणाम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

रावण जैसे दुष्ट का भी,
तोड़ा था अभिमान,
तेरे भक्त की भक्ति आगे,
क्या है मेरा दाम,
तेरे लिए सारे सम हैं,
ख़ास हो या आम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

मेरे घर में आओ बनके,
मेरी देह के प्राण,
आपके चरणों में ही बैठूं,
दो ऐसा वरदान,
तू ही सबका भाग्य विधाता,
कह गया ये यशु जान,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

सरकार

मेरी कविता के ऊपर कोई सरकार नहीं है,
मेरी कविता किसी की मुहताज नहीं है,

और सरकार कब दिखती है,
जब मतदान का समय निकट होता है,
लोगों के पैरों में जा गिरती है,
जब इनके शिकार का समय निकट होता है ,
मगर सरकार मेरी कविता की हकदार नहीं है

देश का नागरिक है आज़ाद,
क्यों दबा हुआ है इन दरिंदो के नीचे,
अभी भी समय है उठे नींद से,
जो हाथ कभी ना आएंगे इसके,
भागता है ऐसे परिंदों के पीछे,
लोकतंत्र तो लोकतंत्र है दिखावे का यार नहीं है

होकर एक दूसरे के ख़िलाफ़,
हमें बेवकूफ़ बनाना इनका काम है
पर आपस में रिश्तेदार हैं सब,
इनका लोगों को आकर्षित करना कामयाब है,
इन्हें अपनी जेब की चिंता है किसी से प्यार नहीं है

यशु तेरी हर कविता, ग़ज़ल,
क्या बिगाड़ सकती है ऐसे शैतानों का
पर मुझे पता है मेरी कविता,
जिस्म तक साड़ सकती है इन हैवानों का,
जनता का इशारा चाहिए और किसी का इंतज़ार नहीं है

हम दरबदर भटकते रहे उनकी तलाश में

हम दरबदर भटकते रहे उनकी तलाश में,
आँखों से अश्क टपकते रहे उनकी तलाश में

वो थे नहीं या ख़ुदा ने ही बनाया ना उनको,
हम बीच में लटकते रहे उनकी तलाश में

मोहब्बत पाक थी हमारी हमने की है सिर्फ वफ़ा,
सब बेवफ़ा समझते रहे उनकी तलाश में

वो महलों में पले और बन गए गुलफ़ाम की तरह,
हम मुश्किलों को गटकते रहे उनकी तलाश में

अब तो यशु में भी दम ना रहा दर-दर भटकने का,
ख़ुद की आँख में खटकते रहे उनकी तलाश में

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