ख़ेमे किए इसतादह-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

ख़ेमे किए इसतादह-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

ख़ेमे किए इसतादह वहीं उठ के किसी ने ।
खोली कमर आराम को हर एक जरी ने ।
रहरासि का दीवान सजाया गुरू जी ने ।
मिलजुल के शरे-शाम भजन गाए सभी ने ।
खाना कई वक्तों से मुयस्सर न था आया ।
इस शाम भी शेरों ने कड़ाका ही उठाया ।

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