ख़त-डॉ. अमरजीत टांडा-Dr. Amarjit Tanda -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

ख़त-डॉ. अमरजीत टांडा-Dr. Amarjit Tanda -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

लिखती रहा करो ख़त
के कमबख्त बहल जाए दिल
नहीं तो
कौन लिखता है ख़त
कोई शांत, ठंडी, वैरान नदिओं को
उदास दिलों को भी लोक ख़त नहीं लिखते

टूटे सितारे किस के ख़त की उडीक करें
पीले पत्तों को भी
कभी किसी ने नहीं लिखा ख़त

मेरी मान लो
लिखती रहा करो ख़त

तेरा ख़त मिलता है
जैसे कोई सलाम आया हो

ख़त में एक उडीक होती है
साया होता है किसी अपने का
किसी की छुह से
कोई नग़मा आता है महकता सुलगता
ख़त मिलने से सांस चलतीं हैं
किसी की
न आये ख़त तो
टपक आते हैं आंसू-मरने को

तू ये नहीं जानती
के मरते आसूँओं को
कोई दफ़नाता नहीं कभी
मुरझा जाएँ फूल तो सजाता नहीं कोई

तू मेरी मान -मेरी जान
रात को एक ख़त लिख कर
डाल दिया कर मेरे सूने दरवाजे के सीने पे
नहीं तो सूनी हो जाएगी
ये दुनिआ ये गलिआं

याद रखना
ख़त आते रहें तो घर गीत गुणगणाते हैं
सूने दरों पे कभी कोई ख़त नहीं आते
और लोग ऐसे घरों के सिरनामे भूल जाते हैं

 

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