हज़र करो मिरे तन से-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

हज़र करो मिरे तन से-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

सजे तो कैसे सजे कत्ले-आम का मेला
किसे लुभायेगा मेरे लहू का बावेला
मिरे नज़ार बदन में लहू ही कितना है
चराग़ हो कोई रौशन न कोई जाम भरे
न उससे आग ही भड़के, न उससे प्यास बुझे
मिरे फ़िगार बदन में लहू ही कितना है

मगर वो ज़हरे-हलाहल भरा है नस-नस में
जिसे भी छेदो, हर इक बून्द ज़हरे-अफ़ई है
हर इक कशीद है सदियों के दर्दो-हसरत की
हर इक में मुहर-ब-लब ग़ैज़ो-ग़म की गरमी है

हज़र करो मिरे तन से, ये सम का दरिया है
हज़र करो कि मिरा तन वो चोबे-सहरा है
जिसे जलायो तो सहने-चमन में दहकेंगे
बजाय सरो-समन मेरी हड्डियों के बबूल
उसे बिखेरा, तो दशतो-दमन में बिखरेगी
बजाय मुशके-सबा मेरी जाने-ज़ार की धूल
हज़र करो कि मिरा दिल लहू का प्यासा है

मारच, १९७१

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