होली- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

होली- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

 

होली है सुखदायिनी, रस बरसे हर ओर।
ढोल नगाड़े बज रहे, गली गली में शोर।।
गली गली में शोर, छा रही नई जवानी।
भूले लोक- लिहाज, कर रहे सब मनमानी।
‘ठकुरेला’ कविराय, मधुरता ऐसी घोली।
मन में बजे मृदंग, थिरकती आई होली।।

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होली आई छा गई, मन में नई उमंग।
भीतर सुख-बारिश हुई, बाहर बरसे रंग।।
बाहर बरसे रंग, झूमते सब नर नारी।
हँसी ठिठोली मग्न, मजे लें बारी-बारी।
‘ठकुरेला’ कविराय, हर तरफ दीखें टोली।
मिटे आपसी भेद, एकता लाई होली।।

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गोरी बौरायी फिरे, आया छलिया फाग।
मन में हलचल भर गई, यह होली की आग।।
यह होली की आग, आपसी बैर भुलाये।
भाये रंग, गुलाल, दूसरी चीज न भाये।
‘ठकुरेला’ कविराय, कर रही जोरा जोरी।
भूली सारे काम, मगन होली में गोरी।।

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होली आने पर रहा, किसे उम्र का भान।
बाल, वृद्ध एवं युवा, सब ही हुए समान।।
सब ही हुए समान, उगे आखों में तारे।
तोड़े सब तटबन्ध, और बौराये सारे।
‘ठकुरेला’ कविराय, प्यार की बोलें बोली।
जो भी आया पास, उसी से हो ली होली।।

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होली है मनमोहिनी, छलकाये मधुजाम।
सब के तन, मन में बसा, आकर मन्मथ काम।।
आकर मन्मथ काम, खुशी में दुनिया सारी।
उड़ने लगे गुलाल, चली बरबस पिचकारी।
‘ठकुरेला’ कविराय, भांग की खायी गोली।
बौराये सब लोग, मोहिनी डाले होली।।

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होली आई, हर तरफ, बिखर गये नवरंग।
रोम रोम रसमय हुआ, बजी अनोखी चंग।।
बजी अनोखी चंग, हुआ मौसम अलबेला।
युवा हुई फिर प्रीति, लगा यादों का मेला।
‘ठकुरेला’ कविराय, हुई गुड़ जैसी बोली।
उमड़ पड़ा अपनत्व, प्यार बरसाये होली।।

 

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