होली की उमंग -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

होली की उमंग -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

अब न इतना गुलाल उड़ता है।
लाल जिस से कि हो सके जल थल।
अब नहीं रंग है बरस पाता।
है न घिरता अबीर का बादल।1।

एक दिन था कि हौसलों से भर।
लोग फूले नहीं समाते थे।
तान ले मोहते तरानों को।
गीत गा रीझ को रिझाते थे।2।

अब न जानें कहाँ गया वह दिन।
याद उसकी बहुत सताती है।
अब कभी वह समा नहीं बँधता।
रुचि थिरती नहीं दिखाती है।3।

थी लुभाती बहुत लहर जिसकी।
है न बहती विनोद धारा वह।
था भरा धूम धाम रव जिसमें।
अब घहरता नहीं नगारा वह।4।

चित्त को तर बतर नहीं करता।
रंग ला रंग राग का सोता।
मेंह जैसे बरस रहे रस में।
मन सराबोर अब नहीं होता।5।

उस तरह से चमक नहीं उठते।
दिल सुने चोज की चुनी बातें।
अब नहीं चोचले दिखा पातीं।
चौगुने चाव से भरी रातें।6।

अब कहाँ है चहल पहल वैसी।
झूमती चाहतें नहीं आतीं।
खोल कर मुँह हँसी नहीं हँसती।
आज चुहलें नहीं चहक पातीं।7।

ठेस कैसे लगे नहीं जी को।
अब ठसक रह गयी ठठोली की।
रंग पर रंग जो जमा पाती।
है कहाँ वह उमंग होली की।8।

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