होलिका दहन रोला -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

होलिका दहन रोला -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

आज सुतिथि पूनो है फागुन मास सरस की।
बहु वर्षा सी जहाँ तहाँ होती है रस की।
मन्द मन्द है मलय पवन बहती मदमाती।
मीठी महक रसाल मंजरी की है आती।1।

वह देखो सामने बड़ी ही भीड़ लगी है।
उसके बीचो बीच जोर से ज्वाल जगी है।
जो लकड़ी की उच्च टाल है धूधू जलती।
बड़े वेग से सवल आग जिसकी है बलती।2।

उस पर दानव-भगिनि होलिका ऐंठी ग्वैंठी।
गोद लिये प्रहलाद कुसुम सम को है बैठी।
झूठे अभिमानों वरदानों का बल पाकर
वह बचने है चली भक्त का गात जलाकर।3।

एक ओर है भक्ति दूसरी दिशि दानवता।
एक ओर कुप्रवृत्ति दूसरी दिशि मानवता।
अंक बीच पामरता के है पुण्य दिखाता।
कूट-नीति की गोद न्याय है शोभा पाता।4।

है कुरीति ने सदाचार को गह कर पकड़ा।
गया कुचाल कुपेचों द्वारा गौरव जकड़ा।
किन्तु हो गये पुण्य न्याय आदिक यश भागी।
हुआ होलिका दहन, बचा बालक बड़भागी।5।

साल साल इसका उत्सव है घर घर होता।
पर अब वैसा रुचिर नहीं है रुचि का सोता।
भूल गये हम मर्म्म परब उत्सव को अपने।
देखा करते हैं उलटी चालों के सपने।6।

झूठे अभिमानों औ कल्पित बातों द्वारा।
दिव्य भाव अपना खोते जाते हैं सारा।
दानवता में हम हैं अपनी भक्ति डुबोते।
पड़कर बुरी प्रवृत्ति बीच मानवता खोते।7।

पामरता औ कूटनीति-झोंकों के आगे।
अहह हमारे पुण्य न्याय फिरते हैं भागे।
सदाचार-मिष कुरीतियों को हैं अपनाते।
हैं कुचाल धारा में गौरव विपुल बहाते।8।

इससे बढ़कर बात कौन दुख की होवेगी।
क्यों न हमारी दशा देख निजता रोवेगी।
गावो, खेलो, हँसो, वाद्य भी विविध बजाओ।
पर गाली बक मत गौरव का गला दबावो।9।

रँगों रंग में उमग अबीर गुलाल लगावो।
किन्तु अधिक जातीय रंगतों को दिखलावो।
जन्म भूमि रज से रंजित निज भाल बनावो।
पर मेरे प्यारे मत अपनी धूल उड़ावो।10।

जो न आँख खुल सकी तो रहोगे पछताते।
तात धयान दो इधर जाति-ममता के नाते।

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