है निय्यत ए ख़ालिस को ख़ता नामुमकिन-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

है निय्यत ए ख़ालिस को ख़ता नामुमकिन-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

है निय्यत ए ख़ालिस को ख़ता नामुमकिन
उस ज़ात से इनसां को बुरा नामुमकिन
कितना भी ज़माने में वह पा जाए अरूज
है कुफर् को तौहीन ए ख़ुदा नामुमकिन

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