हैराँ हैं जबीं आज किधर सज्दा रवाँ है-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

हैराँ हैं जबीं आज किधर सज्दा रवाँ है-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

हैरां है जबीं आज किधर सजदा रवां है
सर पर हैं खुदावन्द, सरे-अर्श ख़ुदा है

कब तक इसे सींचोगे तमन्नाए-समर में
यह सबर का पौधा तो न फूला न फला है

मिलता है ख़िराज इसको तिरी नाने-जवीं से
हर बादशाहे-वक़्त तिरे दर का गदा है

हर-एक उकूबत से है तलख़ी में सवातर
वो रंज, जो-नाकरदा गुनाहों की सज़ा है

एहसान लिये कितने मसीहा-नफ़सों के
क्या कीजीये दिल का न जला है, न बुझा है

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