हे राम !-नीम के पत्ते -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

हे राम !-नीम के पत्ते -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

लो अपना यह न्यास देवता !
बाँह गहो गुणधाम !
भक्त और क्या करे सिवा,
लेने के पावन नाम ?

स्वागत नियति-नियत क्षण मेरे,
बजा विजय की भेरी;
मुक्तिदूत ! जानें कब से थी
मुझे प्रतीक्षा तेरी ।

और कौन तुम तृषित ? अरे,
चुल्लू भर शोणित को ही,
तुम आये ले शस्त्र, व्यर्थ
बनकर समाज के द्रोही ।

मेरा शोणित शमित सके कर
अगर किसी का ताप
घर बैठे पहुँचा आऊँ मैं
उसे न क्यों चुपचाप ?

क्षमा करो देवाधिदेव !
अपराधी किसका कौन ?
इच्छा राम, प्रधान तुम्हारी,
दोष हमारे गौण ।

विदा युध्द जर्जर वसुधे !
किस तरह करूं परितोष?
भेजें राम मुझे लेकर फिर
कभी अमृत का कोष ।

फूंक जगत के कर्णकुहर में
देव ! तुम्हारा नाम,
क्षमा करो देवाधिदेव,
आया, आया हे राम !

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