हे महान् !-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

हे महान् !-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

हे महान् ! तव विस्तृत उर से
दृढ़ परिरम्भण की क्षमता दो,
तव स्नेहोष्ण हृदय का स्पन्दन
सुन पाने की आकुलता दो।
जिस से विवश रहस्य खोल दे
सत्य कि विद्युत विह्वलता दो !
जो तुझ से संघर्ष कर सके
ऐसी उर में कोमलता दो !
तुझ से कर संघर्ष, स्पर्श से
तेरे नव चेतनता आये,
तुझ से कर के युद्ध, क्रुद्ध हो
जीवन यह ऊँचा उठ जाये ।
तेरे तन के अणु-अणु से तव
निरावरणु हो अर्न्तज्वाला,
एक-एक अणु सत्य खोल दे
ऐसी सतह स्वयं चल आये।
तेरे उर की मर्म-ज्वाल को
मुक्त खोलने की ममता दो,
हे महान् तव विस्तृत उर से
दृढ परिरम्भण की क्षमता दो ।

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