हे प्रिये तुम अप्सरा के समान हो-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

हे प्रिये तुम अप्सरा के समान हो-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

[ सौंदर्यपूर्ण एवं उपमित शृंगारिक आद्योपांत रीतिकाल
के श्रृंगार को छंदोत्सर्गों सहित चरितार्थ किया है..
आशान्वित हूँ कि आप सभी शुधी एवं गुणीजन
अंतिम पंक्ति तक बने रहेंगे ]

तुम्हारी काया की चिक्कण रति रूप को लज्जित करे..
तुम्हारा कायिक रचाव अन्यतम, भुवन-भास्वर भी नत हो जाए..
गात का अनुपम संघात, एक चित्ताकर्षक दैवीय अनुष्ठान..

तुम तीनों रूपों में प्रिय हो मुझे.. नारी, महिला और स्त्री!
प्रथम दो में असीम आदर है, सनातन निष्ठा है..
मुझे तो तुम्हारा तीसरा रूप रुचता है – स्त्री!

तुम सद्यस्नाता जैसे पावस ऋतु की बदली..
जो स्पर्श मात्र से तरलायित हो जाए।
छूने भर से बिखर जाने की सम्भावना..
कितना कोमलांग-वैभव!

कुंतल-राशि ..विटप-वल्लरी सी.
अश्वत्थ जैसी शीतल छाँव..
मेरी श्रद्धा, मेरा अन्तस् आश्रय-स्थल.

नयन.. राजस्थानी-लोक जिसे मिरगानैणी कहता है.
पलकों का अवगुंठन और पुतलियों का चञ्चला नर्तन..
लास्यमयी लोचन-संसार.. तीक्ष्ण दृष्टि..
सीधे उर-भेदन की क्षमता.

नासिका कीर सी.. दाड़िम सी दंत-पंक्ति ..
क्षीण-कटि पर दंतक्षतों की नीलकुसुम-माला कभी जो अंकित हो जाए..
आह्ह ..क्या स्वर्गीय आनंद.

कपोल-लाल गुलाबी.. कानों पर बालों का घेरा..
बाली की चमक से दीप्त एक द्वीप जैसे..
अलक-पलक उत्थान-पतन.. चेहरा जैसे चक्रव्यूह..
अधरों पर विस्फारित मृदु हास,
जैसे धरा के आँचल में बिखर गयीं हों पुष्प-पंखुरियाँ..
जमुना नदी का सा डेल्टा पड़ता है होंठों के बीच,
जहाँ फिरती हुई जिव्हा कुछ क्षण ठहरती है..
उस कटाव पर थमी है साँसों की सम्पूर्ण रफ़्तार!

अधरों में तुम्हारे घुली है शहद सी मिठास..
यह लावण्य है- ज्यूँ ज्यूँ पिए कोई प्यासा मरे..

तुम्हारे वक्ष में उतर आयी है चन्द्र की सम्पूर्ण ज्योत्स्ना..
शीतलता, मादकता सब!
उन्नत ललाट सम स्कंध में कसावट..
स्कंध से वक्ष-स्थल तक की फिसलन मुग्ध करने को आतुर..

अंशुक-स्पर्श से सहमी हुई लता सी कोमल बाँह… गौरवर्णी…
बाँह में सिमटने वाले की साँसें उलझती अवश्य होंगी….
वह बड़भागी होगा जिसके शयन को ऐसा तकिया नसीब होता है।

हे कामकला-निपुणा! तुम्हारा नाभि-देश चम्पकहेमवर्ण है.
चंचा श्वेत और हेम पीताभ होता है..
श्वेतिमा और पीतिमा के मिश्रण से एक सम्मोहक कांति उत्पन्न होती है…
नाभिस्थल चम्पा के फूल सा है. गहराव-ठहराव !

रतिसुखाकांक्षिणी आलिंगन को सद्य उत्प्रेरित करने वाला तन लेकर बैठी है..
प्रीति-वचन सुनने को आतुर कान क्लांत हो कई बार सोकर जगते हैं।

चलन में मृग सी चौकड़ी भरती जाती है।
पीछे मुड़कर जो देख ले तो प्रकृति के सञ्चालन-क्रम भंग हो जाता है..
उसका प्रवाह अनुपम!
धरा पर पड़ते पाँव से किंकिण-क्वणन उच्चरता है,
अलिगुंजित पद्मों की किंकिण सा..
मन का व्यामोह रुक जाता है. हृदय में तरल सा कुछ उतर आता है.
अंग-प्रत्यंग में भर आतीं हैं अनंत तरंग!

चितवन से अभिराम मुक्ताहल बिछा देने वाली
मैं तुम्हारा सौंदर्य क्या लिख पाऊँगा..
बस इतना ही पर्याप्त है..!!

 

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