हे निशीथ, हे शान्तमना तपस्वी !-निशीथ-उमाशंकर जोशी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umashankar Joshi

हे निशीथ, हे शान्तमना तपस्वी !-निशीथ-उमाशंकर जोशी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umashankar Joshi

 

हे निशीथ, हे शान्तमना तपस्वी !
तजकर अविश्रान्त विराट ताण्डव
बैठ जाता है तू कभी आसन लगा
हिमाद्रि-सी दृढ़ पालती जमाकर।
धू-धू जलती धूनी उत्क्रान्ति की
दिगन्त में उड़ते उडु-स्फुलिंग
वहाँ निगूढ़ अमा-तमान्तर में
करता तू गहन सृष्टि-रहस्य-चिन्तन।
और जैसे ही हम मानव, जलाकर मन्द दीप
निकलते हैं निरखने तुझे
देखकर जृं भाविकसित चंडमुख तेरा
दृगों से घेर लेते हैं अपनी नन्हीं-सी गृहदीपिका को
और करते हैं प्रयत्न भूल जाने का
व्योम में खिला तेरा रुद्र रूप !

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