हीरामन बेज़ार है उफ़्! किस कदर महँगाई से- धरती की सतह पर -अदम गोंडवी- Adam Gondvi |-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

हीरामन बेज़ार है उफ़्! किस कदर महँगाई से- धरती की सतह पर -अदम गोंडवी- Adam Gondvi |-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

हीरामन बेज़ार है उफ़्! किस कदर महँगाई से ।
आपकी दिल्ली में उत्तर-आधुनिकता आई है ।

टी० वी० से अख़बार तक हैं, जिस्म के मोहक कटाव,
ये हमारी सोच है, ये सोच की गहराई है ।

सबका मालिक एक है, रटते भी हैं, लड़ते भी हैं,
सदियों के संघर्ष से क्या दृष्टि हमने पाई है ।

जो व्यवस्था को बदलने के लिए बेताब थे,
क़ैद उनके बंगले में इस मुल्क की रानाई है ।

रहनुमा धृतराष्ट्र के पद-चिन्ह पर चलने लगे,
आप चुप बैठे रहें ये क़ौम की रुस्वाई है ।

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