हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 1

हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 1

 जो न बन पाई तुम्हारे

जो न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल कड़ी।

तो मधुर मधुमास का वरदान क्या है?
तो अमर अस्तित्व का अभिमान क्या है?
तो प्रणय में प्रार्थना का मोह क्यों है?
तो प्रलय में पतन से विद्रोह क्यों है?
आये, या जाये कहीं—
असहाय दर्शन की घड़ी;
जो न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल कड़ी।

सूझ ने ब्रम्हांड में फेरी लगाई,
और यादों ने सजग धेरी लगाई,
अर्चना कर सोलहों साधें सधीं हाँ,
सोलहों श्रृंगार ने सौहें बदीं हाँ,
मगन होकर, गगन पर,
बिखरी व्यथा बन फुलझड़ी;
जब न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल लड़ी।

याद ही करता रहा यह लाल टीका,
बन चला जंजाल यह इतिहास जी का,
पुष्प पुतली पर प्रणयिनी चुन न पाई,
साँस और उसाँस के पट बुन न पाई,

यह किसका मन डोला

यह किसका मन डोला?
मृदुल पुतलियों के उछाल पर,
पलकों के हिलते तमाल पर,
नि:श्वासों के ज्वाल-जाल पर,
कौन लिख रहा व्यथा कथा?

किसका धीरज `हाँ’ बोला?
किस पर बरस पड़ीं यह घड़ियाँ
यह किसका मन डोला?

कस्र्णा के उलझे तारों से,
विवश बिखरती मनुहारों से,
आशा के टूटे द्वारों से-
झाँक-झाँककर, तरल शाप में-

किसने यों वर घोला
कैसे काले दाग पड़ गये!
यह किसका मन डोला?

फूटे क्यों अभाव के छाले,
पड़ने लगे ललक के लाले,
यह कैसे सुहाग पर ताले!
अरी मधुरिमा पनघट पर यह-

घट का बंधन खोला?
गुन की फाँसी टूटी लखकर
यह किसका मन डोला?

अंधकार के श्याम तार पर,
पुतली का वैभव निखारकर,
वेणी की गाँठें सँवारकर,
चाँद और तम में प्रिय कैसा-

यह रिश्ता मुँह-बोला?
वेणु और वेणी में झगड़ा
यह किसका मन डोला?

बेचारा गुलाब था चटका
उससे भूमि-कम्प का झटका
लेखा, और सजनि घट-घट का!
यह धीरज, सतपुड़ा शिखर-

सा स्थिर, हो गया हिंडोला,
फूलों के रेशे की फाँसी
यह किसका मन डोला?

एक आँख में सावन छाया,
दूजी में भादों भर आया
घड़ी झड़ी थी, झड़ी घड़ी थी
गरजन, बरसन, पंकिल, मलजल,

छुपा `सुवर्ण खटोला’
रो-रो खोया चाँद हाय री?
यह किसका मन डोला?

मैं बरसी तो बाढ़ मुझी में?
दीखे आँखों, दूखे जी में
यह दूरी करनी, कथनी में
दैव, स्नेह के अन्तराल से

गरल गले चढ़ बोला
मैं साँसों के पद सुहला ली
यह किसका मन डोला?

सुनकर तुम्हारी चीज हूँ

सुनकर तुम्हारी चीज हूँ
रण मच गया यह घोर,
वे विमल छोटे से युगल,
थे भीम काय कठोर;

मैं घोर रव में खिंच पड़ा
कितना भयंकर जोर?
वे खींचते हैं, हाय!
ये जकड़े महान कठोर।

हे देव! तेरे दाँव ही
निर्णय करेंगे आप;
उस ओर तेरे पाँव हैं
इस ओर मेरे पाप।

 जिस ओर देखूँ बस

जिस ओर देखूँ बस
अड़ी हो तेरी सूरत सामने,
जिस ओर जाऊँ रोक लेवे
तेरी मूरत सामने।

छुपने लगूँ तुझसे मुझे
तुझ बिन ठिकाना है नहीं,
मुझसे छुपे तू जिस जगह
बस मैं पकड़ पाऊँ वहीं।

मैं कहीं होऊँ न होऊँ
तू मुझे लाखों में हो,
मैं मिटूँ जिस रोज मनहर
तू मेरी आँखों में हो।

 उस प्रभात, तू बात न माने

उस प्रभात, तू बात न माने,
तोड़ कुन्द कलियाँ ले आई,
फिर उनकी पंखड़ियाँ तोड़ीं
पर न वहाँ तेरी छवि पाई,

कलियों का यम मुझ में धाया
तब साजन क्यों दौड़ न आया?

फिर पंखड़ियाँ ऊग उठीं वे
फूल उठी, मेरे वनमाली!
कैसे, कितने हार बनाती
फूल उठी जब डाली-डाली!

सूत्र, सहारा, ढूँढं न पाया
तू, साजन, क्यों दौड़ न आया?

दो-दो हाथ तुम्हारे मेरे
प्रथम `हार’ के हार बनाकर,
मेरी `हारों’ की वन माला
फूल उठी तुझको पहिनाकर,

पर तू था सपनों पर छाया
तू साजन, क्यों दौड़ न आया?

दौड़ी मैं, तू भाग न जाये,
डालूँ गलबहियों की माला
फूल उठी साँसों की धुन पर
मेरी `हार’, कि तेरी `माला’!

तू छुप गया, किसी ने गाया-
रे साजन, क्यों दौड़ न आया!

जी की माल, सुगंध नेह की
सूख गई, उड़ गई, कि तब तू
दूलह बना; दौड़कर बोला
पहिना दो सूखी वनमाला।

मैं तो होश समेट न पाई
तेरी स्मृति में प्राण छुपाया,

युग बोला, तू अमर तस्र्ण है
मति ने स्मृति आँचल सरकाया,
जी में खोजा, तुझे न पाया
तू साजन, क्यों दौड़ न आया?

 नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा

नाद की प्यालियों, मोद की ले सुरा
गीत के तार-तारों उठी छा गई
प्राण के बाग में प्रीति की पंखिनी
बोल बोली सलोने कि मैं आ गई!

नेह दे नाथ क्या नृत्य के रंग में
भावना की रवानी लुटाने चले?
साँस के पास आ, हास के देस छा,
याद को झुलने में झूलाने चले!

प्रेम की जन्म-गाँठों जगी मंगला-
राग वीणा प्रवीणा सखी भारती,
आज ब्रह्माण्ड के गोपिका गा उठी
सूर्य की रश्मियों श्याम की आरती!

जो उँड़ेली कृपा झोलियाँ, प्यार के–
देश ने, आँसुओं में बहीं, आ गई;
प्राण के बाग में प्रीत की पंखिनी
कूक उट्ठी सवेरे कि मैं आ गई!

दूर न रह, धुन बँधने दे

दूर न रह, धुन बँधने दे
मेरे अन्तर की तान,
मन के कान, अरे प्राणों के
अनुपम भोले भान।

रे कहने, सुनने, गुनने
वाले मतवाले यार
भाषा, वाक्य, विराम बिन्दु
सब कुछ तेरा व्यापार;

किन्तु प्रश्न मत बन, सुलझेगा-
क्योंकर सुलझाने से?
जीवन का कागज कोरा मत
रख, तू लिख जाने दे।

उठ अब, ऐ मेरे महाप्राण

उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!

आत्म-कलह पर
विश्व-सतह पर
कूजित हो तेरा वेद गान!
उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!

जीवन ज्वालामय करते हों
लेकर कर में करवाल
करते हों आत्मार्पण से
भू के मस्तक को लाल!

किन्तु तर्जनी तेरी हो,
उनके मस्तक तैयार,
पथ-दर्शक अमरत्व
और हो नभ-विदलिनी पुकार;

वीन लिये, उठ सुजान,
गोद लिये खींच कान,
परम शक्ति तू महान।

काँप उठे तार-तार,
तार-तार उठें ज्वार,
खुले मंजु मुक्ति द्वार।

शांति पहर पर,
क्रान्ति लहर पर
उठ बन जागृति की अमर तान;
उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!

 महलों पर कुटियों को वारो

महलों पर कुटियों को वारो
पकवानों पर दूध-दही,
राज-पथों पर कुंजें वारों
मंचों पर गोलोक मही।

सरदारों पर ग्वाल, और
नागरियों पर बृज-बालायें
हीर-हार पर वार लाड़ले
वनमाली वन-मालायें

छीनूँगी निधि नहीं किसी-
सौभागिनि, पूण्य-प्रमोदा की
लाल वारना नहीं कहीं तू
गोद गरीब यशोदा की।

 सजल गान, सजल तान

सजल गान, सजल तान
स-चमक चपला उठान,
गरज-घुमड़, ठान-ठान
बिन्दु-विकल शीत प्राण;
थोथे ये मोह-गीत
एक गीत, एक गीत!

छू मत आचार्य ’ग्रन्थ’
जिसके पद-पद अनंत,
वाद-वाद, पन्थ-पन्थ,
व्यापक पूरक दिगंत;
लघु मैं, कर मत सभीत।
एक गीत, एक गीत!

छू मत तू प्रणय गान
जिसके उलझे वितान,
मादक, मोहक, मलीन
चूम चाम की लुभान
कर न मुझे चाह-क्रीत,
एक गीत, एक गीत!

संस्कृति का बोझ न छू
छू मत इतिहास-लोक,
छू मत माया न ब्रह्म,
छू मत तू हर्ष-शोक,
सिर पर मत रख अतीत;
एक गीत, एक गीत!

छू मत तू युद्ध-गान
हुंकॄति, वह प्रलय-तान,
बज न उठें जंजीरें,
हथकड़ियाँ छू न प्राण!
मौत नहीं बने मीत
एक गीत, एक गीत!

गीत हो कि जी का हो,
जी से मत फीका हो,
आँसू के अक्षर हों,
स्वर अपने ’ही’ का हो,
प्रलय-हार प्रलय-जीत
एक गीत, एक गीत!

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