हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 5

हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 5

यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे

यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!
भाग्य खोजता है जीवन के
खोये गान ललाम इसी में,
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

अन्धकार लेकर जब उतरी
नव-परिणीता राका रानी,
मानों यादों पर उतरी हो
खोई-सी पहचान पुरानी;

तब जागृत सपने में देखा
मेरे प्राण उदार बहुत हैं!
पर झिलमिल तारों में देखा
’उनके पथ के द्वार बहुत हैं’,

गति न बढ़ाओ, किस पथ जाऊँ,
भूल गया अभिराम इसी में,
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

जब स्वर्गंगा के तारों ने
आँखों के तारे पहिचाने
कोटि-कोटि होने का न्यौता
देने लगे गगन के गाने,

मैं असफल प्रयास, यौवन के
मधुर शून्य को अंक बनाऊँ
तब न कहीं, अनबोली घड़ियों
तेरी साँसों को सुन पाऊँ

मंदिर दूर, मिलन-बेला-
आगई पास, कुहराम इसीमें
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

बाँट चले अमरत्व और विश्वास
कि मुझसे दूर न होंगे!
मानो ये प्रभात तारों से
सपने चकनाचूर न होंगे।

पर ये चरण, कौन कहता है
अपनी गति में रुक जावेंगे,
जिन पर अग-जग झुकता है
वे मेरे खातिर झुक जावेंगे?

अर्पण? और उधार करूँ मैं?
’हारों’ का यह दाम? लुटी मैं!
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

चिड़ियाँ चहकीं, तारों की-
समाधि पर, नभ चीत्कार तुम्हारी!
आँख-मिचौनी में राका-रानी
ने अपनी मणियाँ हारीं।

इस अनगिन प्रकाश से,
गिनती के तारे कितने प्यारे थे?
मेरी पूजा के पुष्पों से
वे कैसे न्यारे-न्यारे थे?

देरी, दूरी, द्वार-द्वार, पथ-
बन्द, न रोको श्याम इसी में
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

हो धीमे पद-चाप, स्नेह की
जंजीरें सुन पड़ें सुहानी
दीख पड़े उन्मत्त, भारती,
कोटि-कोटि सपनों की रानी

यही तुम्हारा गोकुल है,
वृन्दावन है, द्वारिका यहीं है
यहीं तुम्हारी मुरली है
लकुटी है, वे गोपाल यहीं हैं!

’गोधूली’ का कर सिंगार,
मग जोह-जोह लाचार झुकी मैं।
यह चरण ध्वनि धीमे-धीमे!

 दुर्गम हृदयारण्य दण्ड का

दुर्गम हृदयारण्य दण्डका-
रण्य घूम जा आजा,
मति झिल्ली के भाव-बेर
हों जूठे, भोग लगा जा!

मार पाँच बटमार, साँवले
रह तू पंचवटी में,
छिने प्राण-प्रतिमा तेरी
भी, काली पर्ण-कुटी में।

अपने जी की जलन बुझाऊँ,
अपना-सा कर पाऊँ,
“वैदेही सुकुमारि कितै गई”
तेरे स्वर में गाऊँ।

अपना आप हिसाब लगाया

अपना आप हिसाब लगाया
पाया महा दीन से दीन,
डेसिमल पर दस शून्य जमाकर
लिखे जहाँ तीन पर तीन।

इतना भी हूँ क्या? मेरा मन
हो पाया निःशंक नहीं,
पर मेरे इस महाद्वीप का
इससे छोटा अंक नहीं!

भावों के धन, दाँवों के ॠण,
बलिदानों में गुणित बना,
और विकारों से भाजित कर
शुद्ध रूप प्यारे अपना!

वह टूटा जी, जैसा तारा

वह टूटा जी, जैसा तारा!
कोई एक कहानी कहता
झाँक उठा बेचारा!
वह टूटा जी, जैसे तारा!

नभ से गिरा, कि नभ में आया!
खग-रव से जन-रव में आया,
वायु-रुँधे सुर-मग में आया,
अमर तरुण तम-जग में आया,
मिटकर आह, प्राण-रेखा से
श्याम अंक पर अंक बनाता,
अनगिनती ठहरी पलकों पर,
रजत-धार से चाप सजाता?
चला बीतती घटनाओं-सा,-
नभ-सा, नभ से-
बिना सहारा।
और कहानी वाला चुपके
काँख उठा बेचारा!
वह टूटा जी, जैसे तारा!

नभ से नीचे झाँका तारा,
मिले भूमि तक एक सहारा,
सीधी डोरी डाल नजर की
देखा, खिला गुलाब बिचारा,
अनिल हिलाता, अनल रश्मियाँ
उसे जलातीं, तब भी प्यारा-
अपने काँटों के मंदिर से
स्वागत किये, खोल जी सारा,
और कहानी-
वाली आँखों
उमड़ी तारों की दो धारा,
वह टूटा जी, जैसे तारा!

किन्तु फूल भी कब अपना था?
वह तो बिछुड़न थी, सपना था,
झंझा की मरजी पर उसको
बिखर-बिखर ढेले ढँपना था!
तारक रोया, नभ से भू तक
सर्वनाश ही अमर सहारा,
मानो एक कहानी के दो
खंडों ने विधि को धिक्कारा
और कहानी-
वाला बोला-
तीन हुआ जग सारा।
वह टूटा जी, जैसे तारा!

अनिल चला कुरबानी गाने,
जग-दृग तारक-मरण सजाने,
खींच-खींच कर बादल लाने,
बलि पर इन्द्र-धनुष पहिचाने,
टूटे मेघों के जीवन से
कोटि तरल तर तारे,
गरज, भूमि के विद्रोही
भू के जी में उकसाने,
और कहानी वाला चुप,
मैं जीता? ना मैं हारा!
वह टूटा जी, जैसे तारा!

मरुत न रुका नभो मंडल में,
वह दौड़ा आया भूतल में,
नभ-सा विस्तृत, विभु सा प्राणद,
ले गुलाब-सौरभ आँचल में-
झोली भर-भर लगा लुटाने
सुर नभ से उतरे गुण गाने,
उधर ऊग आये थे भू पर,
हरे राज-द्रोही दीवाने!
तारों का टूटना पुष्प की–
मौत, दूखते मेरे गाने,
क्यों हरियाले शाप, अमर
भावन बन, आये मुझे मनाने?
चौंका! कौन?
कहानी वाला!
स्वयं समर्पण हारा
वह टूटा जी, जैसे तारा!

तपन, लूह, घन-गरजन, बरसन
चुम्बन, दृग-जल, धन-आकर्षण
एक हरित ऊगी दुनिया में
डूबा है कितना मेरापन?
तुमने नेह जलाया नाहक,
नभ से भू तक मैं ही मैं था!
गाढ़ा काला, चमकीला घन
हरा-हरा, छ्न लाल-लाल था!
सिसका कौन?
कहानी वाला!
दुहरा कर ध्वनि-धारा!
वह टूटा जी, जैसे तारा!

कैसे मानूँ तुम्हें प्राणधन

कैसे मानूँ तुम्हें प्राणधन
जीवन के बन्दी खाने में,
श्वास-वायु हो साथ, किन्तु
वह भी राजी कब बँध जाने में?

इन्द्र-धनुष यदि स्थायी होते
उनको यदि हम लिपटा पाते,
हरियाली के मतवाले क्यों
रंग-बिरंगे बाग लगाते?

ऊपर सुन्दर अमर अलौकिक
तुम प्रभु-कृति साकार रहो,
मजदूरी के बंधन से उठ-
कर पूजा के प्यार रहो।

दिन आये, मैंने उन पर भी
लिखी तुम्हारी अमर कहानी,
रातें आईं स्मृति लेकर
मैंने ढाला जी का पानी।

घड़ियाँ तुम्हें ढूँढ़ती आईं,
बनी कँटीली कारा-कड़ियाँ
आग लगाकर भी कहलाईं
वे दॄग-सुख वाली फुलझड़ियाँ।

मैंने आँखें मूँदी, तुमको
पकड़ जोर से जी में खींचा,
किन्तु अकेला मेरा मस्तक
ही रह गया, झाँकता नीचा।

मेरी मजदूरी में माधवि,
तुमने प्यार नहीं पहचाना,
मेरी तरल अश्रु-गति पर
अपना अवतार नहीं पहचाना।

मुझमें बे काबू हो जाने–
वाला ज्वार नहीं पहचाना;
और ’बिछुड़’से आमंत्रित
निर्दय संहार नहीं पहचाना।

विद्युति! होओगी क्षण भर
पथ-दर्शक होने का साथी,
यहाँ बदलियाँ ही होंगी
बादल दल के रोने का साथी।

पास रहो या दूर, कसक बन-
कर रहना ही तुमको भाया,
किन्तु हृदय से दूर न जाने
कहाँ-कहाँ यह दर्द उठाया।

मीरा कहती है मतवाली
दरदी को दरदी पहचाने,
दरद और दरदी के रिश्तों–
को, पगली मीरा क्या जाने।

धन्य भाग, जी से पुतली पर
मनुहारों में आ जाते हो,
कभी-कभी आने का विभ्रम
आँखों तक पहुँचा जाते हो।

तुम ही तो कहते हो मैं हूँ
जी का ज्वर उतारने वाला,
व्याकुलता कर दूर, लाड़िली
छबियों का सँवारने वाला।

कालिन्दी के तीर अमित का
अभिमत रूप धारने वाला,
केवल एक सिसक का गाहक,
तन मन प्राण वारने वाला।

ऋतुओं की चढ़-उतर किन्तु
तुममें तूफान उठा कब पाई?
तारों से, प्यारों के तारों
पर आने की सुधि कब आई।

मेरी साँसें उस नभ पर पंख
हों, जहाँ डोलते हो तुम,
मेरी आहें पद सुहलावें
हँसकर जहाँ बोलते हो तुम।

मेरी साधें पथ पर बिछी–
हुई, करती हों प्राण-प्रतीक्षा,
मेरी अमर निराशा बनकर
रहे, प्रणय-मंदिर की दीक्षा।

बस इतना दो, ’तुम मेरे हो’
कहने का अधिकार न खोऊँ,
और पुतलियों में गा जाओ
जब अपने को तुममें खोऊँ!

मैं नहीं बोला, कि वे बोला किये

मैं नहीं बोली, कि वे बोला किये।
हृदय में बेचैन
मुख खोला किये,
दो हृदय ले, तौल पर तौला किये।

यह न था बाजार, पर
उनके तराजू हाथ में थी,
क्रोध के थे, किन्तु उनके
बोल थे कि सनाथ मैं थी,
सुघढ़, मन पर
गर्व को तौला किये,
झूलती, प्रभु-बोल का डोला किये,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किये।

आज चुम्बन का प्रलोभन
स्नेह की जाली न डाली,
नहीं मुझ पर छोड़ने को
प्रेम की नागिन निकाली,
सजनि मेरे
प्राणों का झोला किये;
डालते थे प्यार को, वे क्रोध का गोला किये,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किये।

समय सूली-सा टँगा था,
बोल खूँटी से लगे थे,
मरण का त्यौहार था सखि,
भाग जीवन-धन जगे थे,
रूप के अभिमान में जी का जहर घोला किये,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किये।

 हाँ, याद तुम्हारी आती थी

हाँ, याद तुम्हारी आती थी,
हाँ, याद तुम्हारी भाती थी,
एक तूली थी, जो पुतली पर
तसवीर सी खींचे जाती थी;

कुछ दूख सी जी में उठती थी,
मैं सूख सी जी में उठती थी,
जब तुम न दिखाई देते थे
मनसूबे फीके होते थे;

पर ओ, प्रहर-प्रहर के प्रहरी,
ओ तुम, लहर-लहर के लहरी,
साँसत करते साँस-साँस के
मैंने तुमको नहीं पुकारा!

तुम पत्ती-पत्ती पर लहरे,
तुम कली-कली में चटख पड़े,
तुम फूलों-फूलों पर महके,
तुम फलों-फलों में लटक पड़े,

जी के झुरमुट से झाँक उठे,
मैंने मति का आँचल खींचा,
मुझको ये सब स्वीकार हुए,
आँखें ऊँची, मस्तक नीचा;

पर ओ राह-राह के राही,
छू मत ले तेरी छल-छाँही,
चीख पड़ी मैं यह सच है, पर
मैंने तुमको नहीं पुकारा!

तुम जाने कुछ सोच रहे थे,
उस दिन आँसू पोंछ रहे थे,
अर्पण की हव दरस लालसा
मानो स्वयं दबोच रहे थे,

अनचाही चाहों से लूटी,
मैं इकली, बेलाख, कलूटी
कसकर बाँधी आनें टूटीं,
दिखें, अधूरी तानें टूटीं,

पर जो छंद-छंद के छलिया
ओ तुम, बंद-बंद के बन्दी,
सौ-सौ सौगन्धों के साथी
मैंने तुमको नहीं पुकारा!

तुम धक-धक पर नाच रहे हो,
साँस-साँस को जाँच रहे हो,
कितनी अलः सुबह उठती हूँ,
तुम आँखों पर चू पड़ते हो;

छिपते हो, व्याकुल होती हूँ,
गाते हो, मर-मर जाती हूँ,
तूफानी तसवीर बनें, आँखों
आये, झर-झर जाती हूँ,

पर ओ खेल-खेल के साथी,
बैरन नेह-जेल के साथी,
निज तसवीर मिटा देने में
आँखों की उंडेल के साथी,
स्मृति के जादू भरे पराजय!
मैंने तुमको नहीं पुकारा!

जंजीरें हैं, हथकड़ियाँ हैं,
नेह सुहागिन की लड़ियाँ हैं,
काले जी के काले साजन
काले पानी की घड़ियाँ हैं;

मत मेरे सींखचे बन जाओ,
मत जंजीरों को छुमकाओ,
मेरे प्रणय-क्षणों में साजन,
किसने कहा कि चुप-चुप आओ;

मैंने ही आरती सँजोई,
ले-ले नाम प्रार्थना बोली,
पर तुम भी जाने कैसे हो,
मैंने तुमको नहीं पुकारा!

तुही है बहकते हुओं का इशारा

तुही है बहकते हुओं का इशारा,
तुही है सिसकते हुओं का सहारा,
तुही है दुखी दिलजलों का ’हमारा,
तुही भटके भूलों का है धुर का तारा,

जरा सीखचों में ’समा’ सा दिखा जा,
मैं सुध खो चुकूँ, उससे कुछ पहले आ जा।

पत्थर के फर्श, कगारों में

पत्थर के फर्श, कगारों में
सीखों की कठिन कतारों में
खंभों, लोहे के द्वारों में
इन तारों में दीवारों में

कुंडी, ताले, संतरियों में
इन पहरों की हुंकारों में
गोली की इन बौछारों में
इन वज्र बरसती मारों में

इन सुर शरमीले गुण, गरवीले
कष्ट सहीले वीरों में
जिस ओर लखूँ तुम ही तुम हो
प्यारे इन विविध शरीरों में

Leave a Reply