हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 4

हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 4

 जागना अपराध

जागना अपराध!
इस विजन-वन गोद में सखि,
मुक्ति-बन्धन-मोद में सखि,
विष-प्रहार-प्रमोद में सखि,

मृदुल भावों
स्नेह दावों
अश्रु के अगणित अभावों का शिकारी-
आ गया विध व्याध;
जागना अपराध!
बंक वाली, भौंह काली,
मौत, यह अमरत्व ढाली,
कस्र्ण धन-सी,
तरल घन -सी
सिसकियों के सघन वन-सी,
श्याम-सी,
ताजे, कटे-से,
खेत-सी असहाय,
कौन पूछे?
पुस्र्ष या पशु
आय चाहे जाय,
खोलती सी शाप,
कसकर बाँधती वरदान-
पाप में-
कुछ आप खोती
आप में-
कुछ मान।
ध्यान में, घुन में,
हिये में, घाव में,
शर में,
आँख मूँदें,
ले रही विष को-
अमृत के भाव!
अचल पलक,
अचंचला पुतली
युगों के बीच,
दबी-सी,
उन तरल बूँदों से
कलेजा सींच,
खूब अपने से
लपेट-लपेट
परम अभाव,
चाव से बोली,
प्रलय की साध-
जागना अपराध!

सूझ का साथी

सूझ, का साथी-
मोम-दीप मेरा!

कितना बेबस है यह
जीवन का रस है यह
छनछन, पलपल, बलबल
छू रहा सवेरा,
अपना अस्तित्व भूल
सूरज को टेरा-
मोम-दीप मेरा!

कितना बेबस दीखा
इसने मिटना सीखा
रक्त-रक्त, बिन्दु-बिन्दु
झर रहा प्रकाश सिन्धु
कोटि-कोटि बना व्याप्त
छोटा सा घेरा!
मोम-दीप मेरा!

जी से लग, जेब बैठ
तम-बल पर जमा पैठ
जब चाहूँ जाग उठे
जब चाहूँ सो जावे,
पीड़ा में साथ रहे
लीला में खो जावे!
मोम-दीप मेरा!

नभ की तम गोद भरें-
नखत कोटि; पर न झरें
पढ़ न सका, उनके बल
जीवन के अक्षर ये,
आ न सके उतर-उतर
भूल न मेरे घर ये!
इन पर गर्वित न हुआ
प्रणय गर्व मेरा
मेरे बस साथ मधुर-
मोम-दीप मेरा!

जब चाहूँ मिल जावे
जब चाहूँ मिट जावे
तम से जब तुमुल युद्ध-
ठने, दौड़ जुट जावे
सूझों के रथ-पथ का
ज्वलित लघु चितेरा!
मोम-दीप मेरा!

यह गरीब, यह लघु-लघु
प्राणों पर यह उदार
बिन्दु-बिन्दु
आग-आग
प्राण-प्राण
यज्ञ ज्वार
पीढ़ियाँ प्रकाश-पथिक
जग-रथ-गति चेरा!
मोम-दीप मेरा!

उड़ने दे घनश्याम गगन में

उड़ने दे घनश्याम गगन में|

बिन हरियाली के माली पर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी डाली पर
फूली नहीं समाती तन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

स्मृति-पंखें फैला-फैला कर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुई मस्त दिलदार लगन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

चमक रहीं कलियाँ चुन लूँगी
कलानाथ अपना कर लूँगी
एक बार ’पी कहाँ’ कहूँगी
देखूँगी अपने नैनन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

नाचूँ जरा सनेह नदी में
मिलूँ महासागर के जी में
पागलनी के पागलपन ले–
तुझे गूँथ दूँ कृष्णार्पण में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

बोल राजा, बोल मेरे

बोल राजा, बोल मेरे!

दूर उस आकाश के-
उस पार, तेरी कल्पनाएँ-
बन निराशाएँ हमारी,
भले चंचल घूम आएँ,
किन्तु, मैं न कहूँ कि साथी,
साथ छन भर डोल मेरे!
बोल राजा, बोल मेरे!

विश्व के उपहार, ये-
निर्माल्य! मैं कैसे रिझाऊँ?
कौन-सा इनमें कहूँ ’मेरा’?
कि मैं कैसे चढ़ाऊँ?
चढ़ विचारों में, उतर जी में,
कलंक टटोल मेरे।
बोल राजा, बोल मेरे!

ज्वार जी में आ गया
सागर सरिस खारा न निकले;
तुम्हें कैसे न्यौत दूँ
जो प्यार-सा प्यारा न निकले;
पर इसे मीठा बना
सपने मधुरतर घोल तेरे।
बोल राजा, बोल मेरे!

श्यामता आई, लहर आई,
सलोना स्वाद आया,
पर न जी के सिन्धु में
तू बन अभी उन्माद आया,
आज स्मृति बिकने खड़ी है-
झिड़कियों के मोल तेरे।
बोल राजा, बोल मेरे!

बोल राजा, स्वर अटूटे

बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे

जी से दूर मान बैठी थी
जी से कैसे दूर? बता दो?
ऐ मेरे बनवासी राजा!
दूरी बनी कुसूर? बता दो?
उठ कि भू पर चाँद टूटे
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

उस दिन जिस दिन तुम हँस-
उट्ठे, मैंने पुनर्जन्म को पाया,
फिर मेरे जी में तुम जनमे
मैं फिर नीला-सा हो आया,
अब वियोगिन साँझ टूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे,
मौन का अब बाँध टूटे!

जीवन के इस बगीचे में
सुमन खिले, फल भी तो झूले,
पर मैंने सब फेंक दिये
वे फले-फूले, वे फले-फूले!
प्राण तू मुझसे न छूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे,
मौन का अब बाँध टूटे!

मेरे मानस में संकट के-
कुंज शीश ऊँचा कर आये,
तुतलाने का वचन दिये
मेरी गोदी में तुम भर आये,
बोल अपने कर न झूठे,
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

जी की माला पर लिख दूँ मैं
कैसे तेरा देश निकाला?
मेरी हर धक-धक खिल उट्ठी
फिर क्यूँ चुनूँ फूल की माला?
सुमन के छाले न फूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

जब कि मौन से भी ध्वनि झरती
तब ध्वनि की ध्वनि रोक न राजा
चल कि प्रलय भाँवरिया खेलें!
प्राणों के आँगन में आजा;
आज मैं बन लूँ बधूटी
’बाँध-गाँठ’ कि गाँठ छूटी!
काढ़ जी पर बेल-बूटे
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ

चल पडी चुपचाप सन-सन-सन हुआ,
डालियों को यों चिताने-सी लगी
आँख की कलियाँ, अरी, खोलो जरा,
हिल खपतियों को जगाने-सी लगी

पत्तियों की चुटकियाँ
झट दीं बजा,
डालियाँ कुछ-
ढुलमुलाने-सी लगीं,
किस परम आनन्द-
निधि के चरण पर,
विश्व-साँसें गीत
गाने-सी लगीं।

जग उठा तरु-वृन्द-जग, सुन घोषणा,
पंछियों में चहचहाहट मच गई;
वायु का झोंका जहाँ आया वहाँ-
विश्व में क्यों सनसनाहट मच गई?

हरा हरा कर, हरा

हरा हरा कर, हरा-
हरा कर देने वाले सपने।
कैसे कहूँ पराये, कैसे
गरब करूँ कह अपने!

भुला न देवे यह ’पाना’-
अपनेपन का खो जाना,
यह खिलना न भुला देवे
पंखड़ियों का धो जाना;

आँखों में जिस दिन यमुना-
की तरुण बाढ़ लेती हूँ
पुतली के बन्दी की
पलकों नज़र झाड़ लेती हूँ।

 

तुम्हीं क्या समदर्शी भगवान

तु ही क्या समदर्शी भगवान?
क्या तू ही है, अखिल जगत का
न्यायाधीश महान?

क्या तू ही लिख गया
वासना दुनिया में है पाप?
फिसलन पर तेरी आज्ञा-
से मिलता कुम्भीपाक?

फिर क्या तेरा धाम स्वर्ग है
जो तप, बल से व्याप्त
होती है वासना पूरिणी
वहीं अप्सरा प्राप्त?

क्या तू ही देता है जग-
को, सौदे में आनंद?
क्या तुझसे ही पाते हैं
मानव संकट दुख-द्वन्द्व

क्या तू ही है, जो कहता है
सम सब मेरे पास?
किन्तु प्रार्थना की रिश्वत–
पर करता शत्रु विनाश?

मेरा बैरी हो, क्या उसका
तू न रह गया नाथ?
मेरा रिपु, क्या तेरा भी रिपु
रे समदर्शी नाथ!

क्या तू ही है, पतित अभागों
का शासन करता है?
क्या तू है सम्राट?
लाज, तज न्याय दंड धरता है?

जो तू है, तो मेरा माधव
तू क्यो कर होवेगा
तेरा हरि तो पतितों को
उठने की अंगुलि देगा

गो-गण में जो खेले,
ग्वालों की झिड़की जो झेले
जिसके खेल-कूद से टूटें
जीवन शाप झमेले

माखन पावे वृन्दावन में
बैठा विश्व नचावे;
वह मेरा गोपाल, पतन से
पहिले पतित उठावे!

व्याकुल ही जिसका घर है
अकुलातों का गिरिघर है,
मेरा हव नटवर है, जो
राधा का मुरलीधर है।

मार डालना किन्तु क्षेत्र में

मार डालना किन्तु क्षेत्र में
जरा खड़ा रह लेने दो,
अपनी बीती इन चरणों में
थोड़ी-सी कह लेने दो;

कुटिल कटाक्ष, कुसुम सम होंगे
यह प्रहार गौरव होगा
पद-पद्मों से दूर, स्वर्ग-
भी, जीवन का रौरव होगा।

प्यारे इतना-सा कह दो
कुछ करने को तैयार रहूँ,
जिस दिन रूठ पड़ी
सूली पर चढ़ने को तैयार रहूँ।

 

 

Leave a Reply