हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 3

हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 3

खोने को पाने आये हो

खोने को पाने आये हो?
रूठा यौवन पथिक, दूर तक
उसे मनाने आये हो?
खोने को पाने आये हो?

आशा ने जब अँगड़ाई ली,
विश्वास निगोड़ा जाग उठा,
मानो पा, प्रात, पपीहे का-
जोड़ा प्रिय बन्धन त्याग उठा,
मानो यमुना के दोनों तट
ले-लेकर यमुना की बाहें-
मिलने में असफल कल-कलमें-
रोयें ले मधुर मलय आहें,
क्या मिलन-मुग्ध को बिछुड़न की,
वाणी समझाने आये हो?
खोने को पाने आये हो?

जब वीणा की खूँटी खींची,
बेबस कराह झंकार उठी,
मानो कल्याणी वाणी, उठ-
गिर पड़ने को लाचार उठी,
तारों में तारे डाल-डाल
मनमानी जब मिजराब हुई,
बन्धन की सूली के झूलों-
की जब थिरकन बेताब हुई,
तुम उसको, गोदी में लेकर,
जी भर बहलाने आये हो?
खोने को पाने आये हो?

जब मरे हुए अरमानों की
तुमने यों चिता सजाई है,
उस पर सनेह को सींचा है,
आहों की आग लगाई है,
फिर भस्म हुई आकांक्षाओं-
की माला क्यों पहिनाते हो?
तुम इस बीते बिहाग में
सोरठ की मस्ती क्यों लाते हो?
क्या जीवन को ठुकरा-
मिट्टी का मूल्य बढ़ाने आये हो?
खोने को पाने आये हो?

वह चरण-चरण, सन्तरण राग
मन भावन के मनहरण गीत-
बन; भावी के आँचल से जिस दिन
झाँक-झाँक उट्ठा अतीत,
तब युग के कपड़े बदल-बदल
कहता था माधव का निदेश,
इस ओर चलो, इस ओर बढ़ो!
यह है मोहन का प्रलय देश,
सूली के पथ, साजन के रथ-
की राह दिखाने आये हो?
खोने को पाने आये हो?

गो-गण सँभाले नहीं जाते मतवाले नाथ

गो-गण सँभाले नहीं जाते मतवाले नाथ,
दुपहर आई वर-छाँह में बिठाओ नेक।
वासना-विहंग बृज-वासियों के खेत चुगे,
तालियाँ बजाओ आओ मिल के उड़ाओ नेक।
दम्भ-दानवों ने कर-कर कूट टोने यह,
गोकुल उजाड़ा है, गुपाल जू बसाओ नेक।
मन कालीमर्दन हो, मुदित गुवर्धन हो,
दर्द भरे उर-मधुपुर में समाओ नेक।

धमनी से मिस धड़कन की

धमनी से मिस धड़कन की
मृदुमाला फेर रहे? बोलो!
दाँव लगाते हो? घिर-घिर कर
किसको घेर रहे? बोलो!
माधव की रट है? या प्रीतम-
प्रीतम टेर रहे? बोलो!
या आसेतु-हिमाचल बलि-
का बीज बखेर रहे? बोलो!

या दाने-दाने छाने जाते
गुनाह गिन जाने को,
या मनका मनका फिरता
जीवन का अलाव जगाने को।

भाई, छेड़ो नही, मुझे

भाई, छेड़ो नहीं, मुझे
खुलकर रोने दो
यह पत्थर का हृदय
आँसुओं से धोने दो,
रहो प्रेम से तुम्हीं
मौज से मंजु महल में,
मुझे दुखों की इसी
झोपड़ी में सोने दो।

कुछ भी मेरा हृदय
न तुमसे कह पायेगा,
किन्तु फटेगा; फटे-
बिना क्यों रह पायेगा;
सिसक-सिसक सानंद
आज होगी श्री-पूजा,
बहे कुटिल यह सुख
दु:ख क्यों बह पायेगा।

वारूँ सौ-सौ श्वास
एक प्यारी उसाँस पर,
हारूँ, अपने प्राण, दैव
तेरे विलास पर,
चलो, सखे तुम चलो
तुम्हारा कार्य चलाओ
लगे दुखों की झड़ी
आज अपने निराश पर!

हरि खोया है? नहीं,
हृदय का धन खोया है,
और, न जाने वहीं
दुरात्मा मन खोया है
किन्तु आज तक नहीं
हाय इस तन को खोया,
अरे बचा क्या शेष,
पूर्ण जीवन खोया है।

पूजा के ये पुष्प-
गिरे जाते हैं नीचें,
यह आँसू का स्रोत
आज किसके पद सींचे,
दिखलाती, क्षण मात्र
न आती, प्यारी प्रतिमा
यह दुखिया किस भाँति
उसे भूतल पर खींचे!

 बोल तो किसके लिए मैं

बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

प्राणों की मसोस, गीतों की-
कड़ियाँ बन-बन रह जाती हैं,
आँखों की बूँदें बूँदों पर,
चढ़-चढ़ उमड़-घुमड़ आती हैं!
रे निठुर किस के लिए
मैं आँसुओं में प्यार खोलूँ?
बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

मत उकसा, मेरे मन मोहन कि मैं
जगत-हित कुछ लिख डालूँ,
तू है मेरा जगत, कि जग में
और कौन-सा जग मैं पा लूँ!
तू न आए तो भला कब-
तक कलेजा मैं टटोलूँ?
बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

तुमसे बोल बोलते, बोली-
बनी हमारी कविता रानी,
तुम से रूठ, तान बन बैठी
मेरी यह सिसकें दीवानी!
अरे जी के ज्वार, जी से काढ़
फिर किस तौल तोलूँ
बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

तुझे पुकारूँ तो हरियातीं-
ये आहें, बेलों-तरुओं पर,
तेरी याद गूँज उठती है
नभ-मंडल में विहगों के स्वर,
नयन के साजन, नयन में-
प्राण ले किस तरह डोलूँ!
बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

भर-भर आतीं तेरी यादें
प्रकृति में, बन राम कहानी,
स्वयं भूल जाता हूँ, यह है
तेरी याद कि मेरी बानी!
स्मरण की जंजीर तेरी
लटकती बन कसक मेरी
बाँधने जाकर बना बंदी
कि किस विधि बंद खोलूँ!
बोल तो किसके लिए मैं
गीत लिक्खूँ, बोल बोलूँ?

 मन धक-धक की माला गूँथे

मन धक-धक की माला गूँथे,
गूँथे हाथ फूल की माला,
जी का रुधिर रंग है इसका
इसे न कहो, फूल की माला!

पंकज की क्या ताब कि तुम पर–
मेरे जी से बढ़ कर फूले,
मैं सूली पर झूल उठूँ
तब, वह ’बेबस’ पानी पर झूले!

तुम रीझो तो रीझो साजन,
लख कर पंकज का खिल जाना
युग-धन! सीखे कौन, नेह में–
डूब चुके तब ऊपर आना!
पत्थर जी को, पानी कर-कर
सींचा सखे, चरण-नंदन में
यह क्या? पद-रज ऊग उठी
मुझको भटकाया बीहड़ वन में

नभ बन कर जब मैंने ताना
अंधकार का ताना-बाना,
तुम बन आये चंदा बाबू
रहा तुम्हें अब कौन ठिकाना!

नजर बन्द तू लिये चाँदनी
घूम गगन में, बिना सहारा,
मेरे स्वर की रानी झाँके
बन कर छोटा-सा ध्रुव तारा

मैं बन आया रोते-रोते
जब काला-सा खारा सागर,
तब तुम घन-श्याम आ बरसे
जी पर काले बादल बन कर,

हारा कौन? कि बरस-बरस कर
तुमने मेरी शक्ति बढ़ाई,
तेरी यह प्रहार-माला मेरे
जी में मोती बन आई

मैं क्या करता उनको लेकर
तेरी कृपा तुझे पहिना दी,
उमड़-घुमड़ कर फिर लहरों–
से, मैंने प्रलय-रागिनी गा दी!

जब तुम आकर नभ पर छाये
’कलानाथ’बन चंदा बाबू
मैं सागर, पद छूने दौड़ा
ज्वार लिये होकर बेकाबू!

आ जाओ अब जी में पाहुन,
जग न जान पाये ’अनजानी’
कैदी! क्या लोगे? बोलो तो
काला गगन? कि काला पानी?

जब बादल में छुप कर, उसके
गर्जन में तुम बोले बोली
तब ज्वारों की भैरव-ध्वनि की
मैंने अपनी थैली खोली!

मेरी काली घहराई को
विद्युत चमका कर शरमाया
क्षणिक सजीले, इसीलिए मैं
अपने हीरे मोती लाया!

आज प्राण के शेष नाग पर
माधव होकर पौढ़ो राजा!
मेरे चन्द खिलौना जी के
श्यामल सिंहासन पर आ जा!

कौन? याद की प्याली में

कौन? याद की प्याली में
बिछुड़ना घोलता-सा क्यों है?
और हृदय की कसकों में
गुप-चुप टटोलता-सा क्यों है?

अरे पुराने दुःख-दर्दों की
गाँठ खोलता-सा क्यों है?
महा प्रलय की वाणी में
उन्मत्त बोलता-सा क्यों है?

क्या है? है यह पुनः
मधुर आमंत्रण जंजीरों का?
है तू कौन? खिलाड़ी,
प्रेरक मरदानों वीरों का?

 माधव दिवाने हाव-भाव

माधव दिवाने हाव-भाव
पै बिकाने
अब कोई चहै वन्दै
चहै निन्दै, काह परवाह
वौरन ते बातें जिन
कीजो नित आय-आय
ज्ञान, ध्यान, खान, पान
काहू की रही न चाह

भोगन के व्यूह, तुम्हें
भोगिबो हराम भयो
दुख में उमाह, इहाँ
चाहिये सदा ही आह,
विपदा जो टूटै
कोऊ सब सुख लूटै
एक माधव न छूटै
तो कराह की सदा सराह!

आज नयन के बँगले में

आज नयन के बँगले में
संकेत पाहुने आये री सखि!

जी से उठे
कसक पर बैठे
और बेसुधी-
के बन घूमें
युगल-पलक
ले चितवन मीठी,
पथ-पद-चिह्न
चूम, पथ भूले!
दीठ डोरियों पर
माधव को

बार-बार मनुहार थकी मैं
पुतली पर बढ़ता-सा यौवन
ज्वार लुटा न निहार सकी मैं !
दोनों कारागृह पुतली के
सावन की झर लाये री सखि!

आज नयन के बँगले में
संकेत पाहुने आये री सखि !

यह अमर निशानी किसकी है?

यह अमर निशानी किसकी है?
बाहर से जी, जी से बाहर-
तक, आनी-जानी किसकी है?
दिल से, आँखों से, गालों तक-
यह तरल कहानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

रोते-रोते भी आँखें मुँद-
जाएँ, सूरत दिख जाती है,
मेरे आँसू में मुसक मिलाने
की नादानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

सूखी अस्थि, रक्त भी सूखा
सूखे दृग के झरने
तो भी जीवन हरा ! कहो
मधु भरी जवानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

रैन अँधेरी, बीहड़ पथ है,
यादें थकीं अकेली,
आँखें मूँदें जाती हैं
चरणों की बानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

आँखें झुकीं पसीना उतरा,
सूझे ओर न ओर न छोर,
तो भी बढ़ूँ, खून में यह
दमदार रवानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

मैंने कितनी धुन से साजे
मीठे सभी इरादे
किन्तु सभी गल गए, कि
आँखें पानी-पानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

जी पर, सिंहासन पर,
सूली पर, जिसके संकेत चढ़ूँ
आँखों में चुभती-भाती
सूरत मस्तानी किसकी है?
यह अमर निशानी किसकी है?

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