हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 2

हिम तरंगिणी -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Part 2

तुम मन्द चलो

तुम मन्द चलो,
ध्वनि के खतरे बिखरे मग में-
तुम मन्द चलो।

सूझों का पहिन कलेवर-सा,
विकलाई का कल जेवर-सा,
घुल-घुल आँखों के पानी में-
फिर छलक-छलक बन छन्द चलो।
पर मन्द चलो।

प्रहरी पलकें? चुप, सोने दो!
धड़कन रोती है? रोने दो!
पुतली के अँधियारे जग में-
साजन के मग स्वच्छन्द चलो।
पर मन्द चलो।

ये फूल, कि ये काँटे आली,
आये तेरे बाँटे आली!
आलिंगन में ये सूली हैं-
इनमें मत कर फर-फन्द चलो।
तुम मन्द चलो।

ओठों से ओठों की रूठन,
बिखरे प्रसाद, छुटे जूठन,
यह दण्ड-दान यह रक्त-स्नान,
करती चुपचाप पसंद चलो।
पर मन्द चलो।

ऊषा, यह तारों की समाधि,
यह बिछुड़न की जगमगी व्याधि,
तुम भी चाहों को दफनाती,
छवि ढोती, मत्त गयन्द चलो।
पर मन्द चलो।

सारा हरियाला, दूबों का,
ओसों के आँसू ढाल उठा,
लो साथी पाये-भागो ना,
बन कर सखि, मत्त मरंद चलो।
तुम मन्द चलो।

ये कड़ियाँ हैं, ये घड़ियाँ हैं
पल हैं, प्रहार की लड़ियाँ हैं
नीरव निश्वासों पर लिखती-
अपने सिसकन, निस्पन्द चलो।
तुम मन्द चलो।

चलो छिया-छी हो अन्तर में

चलो छिया-छी हो अन्तर में!
तुम चन्द
मैं रात सुहागन

चमक-चमक उट्ठें आँगन में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

बिखर-बिखर उट्ठो, मेरे धन,
भर काले अन्तस पर कन-कन,
श्याम-गौर का अर्थ समझ लें

जगत पुतलियाँ शून्य प्रहर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

किरनों के भुज, ओ अनगिन कर
मेलो, मेरे काले जी पर
उमग-उमग उट्ठे रहस्य,

गोरी बाँहों का श्याम सुन्दर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

मत देखो, चमकीली किरनो
जग को, ओ चाँदी के साजन!
कहीं चाँदनी मत मिल जावे

जग-यौवन की लहर-लहर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

चाहों-सी, आहों-सी, मनु-
हारों-सी, मैं हूँ श्यामल-श्यामल
बिना हाथ आये छुप जाते

हो, क्यों! प्रिय किसके मंदिर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

कोटि कोटि दृग! मैं जगमग जो-
हूँ काले स्वर, काले क्षण गिन,
ओ उज्ज्वल श्रम कुछ छू दो

पटरानी को तुम अमर उभर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

चमकीले किरनीले शस्त्रों
काट रहे तम श्यामल तिल-तिल
ऊषा का मरघट साजोगे?

यही लिख सके चार पहर में?
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

ये अंगारे, कहते आये
ये जी के टुकडे, ये तारे
`आज मिलोगे’, `आज मिलोगे’,

पर हम मिलें न दुनिया-भर में
चलो छिया-छी हो अन्तर में!

 वे तुम्हारे बोल

वे तुम्हारे बोल!
वह तुम्हारा प्यार, चुम्बन,
वह तुम्हारा स्नेह-सिहरन
वे तुम्हारे बोल!

वे अनमोल मोती
वे रजत-क्षण!
वह तुम्हारे आँसुओं के बिन्दु
वे लोने सरोवर
बिन्दुओं में प्रेम के भगवान का
संगीत भर-भर!
बोलते थे तुम,
अमर रस घोलते थे
तुम हठीले,
पर हॄदय-पट तार
हो पाये कभी मेरे न गीले!
ना, अजी मैंने
सुने तक भी–
नहीं, प्यारे–
तुम्हारे बोल,
बोल से बढ़कर, बजा, मेरे हृदय में
सुख क्षणों का ढोल!
वे तुम्हारे बोल!

किंतु
आज जब,
तुव युगुल-भुज के
हार का
मेरे हिये में–
है नहीं उपहार,
आज भावों से भरा वह–
मौन है, तव मधुर स्वर सुकुमार!
आज मैंने
बीन खोई
बीन-वादक का
अमर स्वर-भार
आज मैं तो
खो चुका
साँसें-उसाँसें;
और अपना लाड़ला
उर ज्वार!

आज जब तुम
हो नहीं, इस-
फूस कुटिया में
कि कसक समेत;
’चेत’ की चेतावनी देने
पधारे हिय-स्वभाव अचेत।
और यह क्या,
वे तुम्हारे बोल!
जिनको वध किया था
पा तुम्हें “सुख साथ!”
कल्पना के रथ चढ़े आये
उठाये तर्जना का हाथ।

आज तुम होते कि
यह वर माँगता हूँ
इस उजड़ती हाट में
घर माँगता हूँ!
लौटकर समझा रहे
जी भा रहे तव बोल,
बोल पर, जी दूखता है
रहे शत शिर डोल,
जब न तुम हो तब
तुम्हारे बोल लौटे प्राण
और समझाने लगे तुम
प्राण हो तुम प्राण!
प्राण बोलो वे तुम्हारे बोल!
कल्पना पर चढ़
उतर जी पर
कसक में घोल
एक बिरिया
एक विरिया
फिर कहो वे बोल!

 जब तुमने यह धर्म पठाया

जब तुमने यह धर्म पठाया
मुँह फेरा, मुझसे बिन बोले,
मैंने चुप कर दिया प्रेम को
और कहा मन ही मन रो ले
कौन तुम्हारी बातें खोले!

ले तेरा मजहब यह दौड़ा
मौन प्रेम से कलह मचाने,
और प्रेम ने प्रलय-रागिनी-
भर दी अग-जग में अनबोले
कौन तुम्हारी बातें खोले!

मैंने बात तुम्हारी मानी
ठुकरा दिया प्रेम को जीकर,
मर-मर कर मैं चढ़ा शिखर पर
प्रेम चढ़ा सूली पर डोले,
कौन तुम्हारी बातें खोले!

मैंने सोचा अपने मजहब-
में तुम एक बार आओगे,
तुम आये, छुप गए प्रेम में
मेरे गिरे आँख से ओले।
कौन तुम्हारी बातें खोले!

बाहों में ले, दौड़-धूप कर
मैंने मज़हब को दुलराया,
पर तुम मुझको धोखा देकर
अरे, प्रेम के जी से बोले,
कौन तुम्हारी बातें खोले!

मैं बस लौट पड़ा मज़हब के
पर्वत से, सागर को धोया,
मानो गंगा का यह सोता
पतनोन्मुखी पतन-पथ डोले
कौन तुम्हारी बातें खोले!

सिंधु उठाया जी भर आया
थोड़ा-पा दिल खाली देखा,
पलकें बोल उठीं अनजाने
कौन नेह पर मजहब तोले
कौन तुम्हारी बातें खोले!

आँखों के परदों पर देखा
प्रेमराज, अंजलि भर दौड़े
रे घटवासी, मैंने वे घट
तेरे ही चरणों पर ढोले;
कौन तुम्हारी बातें खोले!

आह! प्रेम का खारा पानी-
उसका धन, मेरी नादानी-
किस पर फेंकूँ अत्याचारी-
साजन! तू पग थलियाँ धोले।
कौन तुम्हारी बातें खोले!

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मेरी सुरत बावली बोली-
उतर न सके प्राण सपनों से,
मुझे एक सपने में ले ले।
मेरा कौन कसाला झेले?

तेर एक-एक सपने पर
सौ-सौ जग न्यौछावर राजा।
छोड़ा तेरा जगत-बखेड़ा
चल उठ, अब सपनों में खेलें?
मेरा कौन कसाला झेले?

देख, देख, उस ओर `मित्र’ की
इस बाजू पंकज की दूरी,
और देख उसकी किरनों में
यह हँस-हँस जय माला मेले।
मेरा कौन कसाला झेले?

पंकज का हँसना,
मेरा रो देना,
क्या अपराध हुआ यह?
कि मैं जन्म तुझमें ले आया
उपजा नहीं कीच के ढेले।
मेरा कौन कसाला झेले?

तो भी मैं ऊषा के स्वर में
फूल-फूल मुख-पंकज धोकर
जी, हँस उठी आँसुओं में से
छुपी वेदना में रस घोले।
मेरा कौन कसाला झेले?

कितनी दूर?
कि इतनी दूरी!
ऊगे भले प्रभाकर मेरे,
क्यों ऊगे? जी पहुँच न पाता
यह अभाग अब किससे खेले?
मेरा कौन कसाला झेले?

प्रात: आँसू ढुलकाकर भी
खिली पखुड़ियाँ, पंकज किलके,
मैं भाँवरिया खेल न जानी
अपने साजन से हिल-मिल के।
मेरा कौन कसाला झेले?

दर्पण देखा, यह क्या दीखा?
मेरा चित्र, कि तेरी छाया?
मुसकाहट पर चढ़कर बैरी
रहा बिखेरे चमक के ढेले,
मेरा कौन कसाला झेले?

यह प्रहार? चोखा गठ-बंधन!
चुंबन में यह मीठा दंशन।
`पिये इरादे, खाये संकट’
इतना क्या कम है अपनापन?
बहुत हुआ, ये चिड़ियाँ चहकीं,
ले सपने फूलों में ले ले।
मेरा कौन कसाला झेले?

 सुलझन की उलझन है

सुलझन की उलझन है,
कैसी दीवानी, दीवानी!
पुतली पर चढ़कर गिरता
गिर कर चढ़ता है पानी!

क्या ही तल के पागलपन का
मल धोने आई हैं?
प्रलयंकर शंकर की गंगा
जल होने आई हैं?

बूँदे , बरछी की नौकों-सी
मुझसे खेल रही है!
पलकों पर कितना प्राणों–
का ज्वार ढकेल रही है!

अब क्या रुम-झुम से छुमकेगा-
आँगन ग्वालिनियों का?
बन्दी गृह दे वैभव पर
आँखें डालेंगी डाका?

मत झनकार जोर से

मत झनकार जोर से
स्वर भर से तू तान समझ ले,
नीरस हूँ, तू रस बरसाकर,
अपना गान समझ ले।

फौलादी तारों से कस ले
’बंधन, मुझ पर बस ले,
कभी सिसक ले
कभी मुसक ले
कभी खीझकर हँस ले,

कान खेंच ले,
पर न फेंक,
गोदी से मुझे उठाकर,
कर जालिम
अपनी मनमानी
पर,
’जी’ से लिपटाकर!

मुझ पर उतर
ऊग तारों पर
बोकर,
निज तरुणाई!
पथ पायें
युग की रवि-किरनें
तेरी देख ललाई,

कभी पनपने दे
मानस कुंजों में,
करुण कहानी!
कभी लहरने दे
पंखों-सी,
पलक-पंक्तियाँ, मानी

कभी भैरवी को
मस्तक दल पर
चढ़कर आने दे,
कैसा सखे कसाला, बलि-स्वर-
माला गुँथ जाने दे!

जहाँ से जो ख़ुद को

जहाँ से जो ख़ुद को
जुदा देखते हैं
ख़ुदी को मिटाकर
ख़ुदा देखते हैं ।
फटी चिन्धियाँ पहिने,
भूखे भिखारी
फ़कत जानते हैं
तेरी इन्तज़ारी
बिलखते हुए भी
अलख जग रहा है
चिदानंद का
ध्यान-सा लग रहा है ।
तेरी बाट देखूँ,
चने तो चुगा जा,
हैं फैले हुए पर,
उन्हें कर लगा जा,
मैं तेरा ही हूँ इसकी
साखी दिला जा,
ज़रा चुहचुहाहट
तो सुनने को आ जा,
जो तु यों इछुड़ने-
बिछुडने लगेगा
तो पिंजड़े का पंछी
भी उड़ने लगेगा ।

मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक

मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक!
प्रलय-प्रणय की मधु-सीमा में
जी का विश्व बसा दो मालिक!

रागें हैं लाचारी मेरी,
तानें बान तुम्हारी मेरी,
इन रंगीन मृतक खंडों पर,
अमृत-रस ढुलका दो मालिक!
मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक!

जब मेरा अलगोजा बोले,
बल का मणिधर, स्र्ख रख डोले,
खोले श्याम-कुण्डली विष को
पथ-भूलना सिखा दो मालिक!
मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक!

कठिन पराजय है यह मेरी
छवि न उतर पाई प्रिय तेरी
मेरी तूली को रस में भर,
तुम भूलना सिखा दो मालिक!
मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक!

प्रहर-प्रहर की लहर-लहर पर
तुम लालिमा जगा दो मालिक!
मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक!

मैंने देखा था, कलिका के

मैंने देखा था, कलिका के
कंठ कालिमा देते
मैंने देखा था, फूलों में
उसको चुम्बन लेते
मैंने देखा था, लहरों पर
उसको गूँज मचाते
दिन ही में, मैंने देखा था
उसको सोरठ गाते।

दर्पण पर, सिर धुन-धुन मैंने
देखा था बलि जाते
अपने चरणों से ॠतुओं को
गिन-गिन उसे बुलाते
किन्तु एक मैं देख न पाई
फूलों में बँध जाना;
और हॄदय की मूरत का यों
जीवित चित्र बनाना!

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