हार सहज स्वीकार नहीं है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

हार सहज स्वीकार नहीं है।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

यह कैसी है घिरी निराशा ?
भटक रहा तू दर-दर प्यासा,
बाधा अडिग खड़ी पथ होती
सागर के तल मिलता मोती।
जीवन मृदु – रसधार नहीं है
हार सहज स्वीकार नहीं है।

विविध रंग में जीवन ढलता
शान्त कहीं तो कहीं उबलता,
है विचित्र जीवन की धारा
तम आता लेकर उजियारा।
पथिक गिरा हर बार नहीं है
हार सहज स्वीकार नहीं है।

गिरने को तू हार न मानो
गिरे बिना उद्धार न मानो,
जीवन गिरके उठ जाना है
गिर -गिरके हमने जाना है।
बिन जीते जयकार नहीं है
हार सहज स्वीकार नहीं है।

 

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