हार न अपनी मानूँगा-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

हार न अपनी मानूँगा-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

हार न अपनी मानूँगा मैं!

चाहे पथ में शूल बिछाओ,
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,
किन्तु मुझे अब जाना ही है-
तलवारों की धारों पर भी हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!

मन में मरु-सी प्यास जगाओ,
रस की बूंद नहीं बरसाओ,
किन्तु मुझे जब जीना ही है-
मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!

चाहे चिर गायन सो जाए,
और हृदय मुर्दा हो जाए,
किन्तु मुझे जब गाना ही है-
बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!

Leave a Reply