हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए
छूट जाए तो वही अपना गरेबाँ हो जाए

इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा
हुस्न यूँ लाख छुपे लाख नुमायाँ हो जाए

होश-ओ-ग़फ़लत से बहुत दूर है कैफ़िय्यत-ए-इश्क़
इस की हर बे-ख़बरी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हो जाए

आँख वो है जो तिरी जल्वा-गह-ए-नाज़ बने
दिल वही है जो सरापा तिरा अरमाँ हो जाए

इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो
इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए

ये भी सच है कोई उल्फ़त में परेशाँ क्यूँ हो
ये भी सच है कोई क्यूँकर न परेशाँ हो जाए

उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है ‘फ़िराक़’
कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए

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