हाए कैसी वो शाम होती है-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

हाए कैसी वो शाम होती है-ग़ज़लें-नौशाद अली(नौशाद लखनवी)-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naushad Ali

हाए कैसी वो शाम होती है
दास्ताँ जब तमाम होती है

ये तो बातें हैं सिर्फ़ ज़ाहिद की
कहीं मय भी हराम होती है

शाम-ए-फ़ुर्क़त की उलझनें तौबा
किस ग़ज़ब की ये शाम होती है

इश्क़ में और क़रार क्या मअ’नी
ज़िंदगी तक हराम होती है

हो के आती है जब उधर से सबा
कितनी नाज़ुक-ख़िराम होती है

ये तसद्दुक़ है उन की ज़ुल्फ़ों का
मेरी हर सुब्ह शाम होती है

जब भी होती हैं जन्नतें तक़्सीम
हूर ज़ाहिद के नाम होती है

लम्हे आते हैं वो भी उल्फ़त में
जब ख़मोशी कलाम होती है

पीने वाला हो गर तो साक़ी की
हर नज़र दौर-ए-जाम होती है

हर अदा हम अदा-शनासों की
ज़िंदगी का पयाम होती है

वक़्त ठहरा हुआ सा है ‘नौशाद’
न सहर और न शाम होती है

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