हां मुल्क-ए-सुख़न की-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

हां मुल्क-ए-सुख़न की-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

हां मुल्क-ए-सुख़न की मुझे जागीर अता कर ।
लफ़्ज़ों को मिरे बरुश-ए-शमशीर अता कर ।
बेमिसल मुझे कुव्वत-ए-तहरीर अता कर ।
तू आप मुअस्सर है वुह तासीर अता कर ।
मुश्किल तो नहीं, गर मिरे मौला का कर्म हो ।
नायाब सी शै गंज-ए-शहीदां येह रकम हो ।

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