हर दिन उठ कर लगता है-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

हर दिन उठ कर लगता है-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

 

हर दिन उठ कर लगता है,
कि ईश्वर ने आयु कम की।
फिर भी भ्रष्ट रहे हैं लोग,
अपनी कमजोरी अपने में हवन की।।

देखा भ्रष्टाचार के पग को चलते हुए,
बिना कुछ बोले पर चँहु ओर बढ़ते हुए।
इसे मिटाने के नारों में महज दिखावा था,
हे ईश्वर यह देख व्यथित मैं,
लोगों ने महज दिखावे में दहन की।

हर दिन उठ कर लगता है,
कि ईश्वर ने आयु कम की।
फिर भी भ्रष्ट रहे हैं लोग,
अपनी कमजोरी अपने में हवन की।।

देखा पैसों के रोब पर न्याय बिकते हुए,
दुखियारी आँखों में अश्रु का सैलाब बहते हुए।
नेताओं के ही कथनी करनी में अंतर था।
हे ईश्वर सोचा सैलाब रुके,
सूखी आंखों ने कहानी कथन की।।

हर दिन उठ कर लगता है,
कि ईश्वर ने आयु कम की।
फिर भी भ्रष्ट रहे है लोग,
अपनी कमजोरी अपने में हवन की । ।

देखा सड़क पार जाने को,
अंधे को विलाप करते हुए।
गुजरते युवाओं के दलो को,
जवानी का गुमान भरते हुये।।

मैंने इस दिशा में कई बार,
सड़क पार करवाया था।
हे ईश्वर उसके मुंह से निकलती आशीषों ने,
मेरे अंतर्मन में ठंडन की।।

हर दिन उठ कर लगता है,
कि ईश्वर ने आयु कम की।
फिर भी भ्रष्ट रहे हैं लोग,
अपनी कमजोरी अपने मे हवन की।।

 

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