हरी घास पर क्षण भर अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya

हरी घास पर क्षण भर अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya, 5

देखती है दीठ

हँस रही है वधू-जीवन तृप्तिमय है।
प्रिय-वदन अनुरक्त-यह उस की विजय है।
गेह है, गति, गीत है, लय है, प्रणय है:

सभी कुछ है।
देखती है दीठ-
लता टूटी, कुरमुराता मूल में है सूक्ष्म भय का कीट!

शिलङ्, 15 नवम्बर, 1945

किरण मर जाएगी

किरण मर जाएगी!

लाल होके झलकेगा भोर का आलोक-
उर का रहस्य ओठ सकेंगे न रोक।
प्यार की नीहार-बूँद मूक झर जाएगी!
इसी बीच किरण मर जाएगी!

ओप देगा व्योम श्लथ कुहासे का जाल-
कड़ी-कड़ी छिन्न होगी तारकों की माल।
मेरे माया-लोक की विभूति बिखर जाएगी!
इसी बीच किरण मर जाएगी!

लखनऊ, 4 नवम्बर, 1946

 एक आटोग्रॉफ़

अल्ला रे अल्ला
होता न मनुष्य मैं, होता करमकल्ला।
रूखे कर्म-जीवन से उलझा न पल्ला।
चाहता न नाम कुछ, माँगता न दाम कुछ,

करता न काम कुछ, बैठता निठल्ला-
अल्ला रे अल्ला!

इलाहाबाद, 30 जुलाई, 1946

क्षमा की वेला

आह-
भूल मुझ से हुई-मेरा जागता है ज्ञान,
किन्तु यह जो गाँठ है साझी हमारी,
खोल सकता हूँ अकेला कौन से अभिमान के बल पर?
-हाँ, तुम्हारे चेतना-तल पर

तैर आये अगर मेरा ध्यान,
और हो अम्लान (चेतना के सलिल से धुल कर)
तो वही हो क्षमा की वेला-
अनाहत संवेदना ही में तुम्हारी लीन हो परिताप, छूटे शाप,
मुक्ति की बेला-मिटे अन्तर्दाह!

दिल्ली-गुरदासपुर, 27 जुलाई, 1946

उनींदी चाँदनी

उनींदी चाँदनी उठ खोल अन्तिम मेघ वातायन
मिलें दो-चार हम को भी शरद के हास मुक्ताकन

अक्टूबर, 1948

सो रहा है झोंप

सो रहा है झोंप अँधियाला नदी की जाँघ पर:
डाह से सिहरी हुई यह चाँदनी
चोर पैरों से उझक कर झाँक जाती है।

प्रस्फुटन के दो क्षणों का मोल शेफाली
विजन की धूल पर चुपचाप
अपने मुग्ध प्राणों से अजाने आँक जाती है।

लखनऊ-इलाहाबाद, अक्टूबर, 1948

शक्ति का उत्पाद

क्रान्ति है आवत्र्त, होगी भूल उस को मानना धारा:
उपप्लव निज में नहीं उद्दिष्ट हो सकता हमारा।
जो नहीं उपयोज्य, वह गति शक्ति का उत्पाद भर है:
स्वर्ग की हो-माँगती भागीरथी भी है किनारा।

इलाहाबाद, 13 नवम्बर, 1946

वसंत की बदली

यह वसन्त की बदली पर क्या जाने कहीं बरस ही जाय?
विरस ठूँठ में कहीं प्यार की कोंपल एक सरस ही जाय?
दूर-दूर, भूली ऊषा की सोयी किरण एक अलसानी-
उस की चितवन की हलकी-सी सिहरन मुझे परस ही जाय?

लखनऊ, 8 मार्च, 1948

 विश्वास का वारिद

रो उठेगी जाग कर जब वेदना,
बहेंगी लूहें विरह की उन्मना,
-उमड़ क्या लाया करेगा हृदय में
सर्वदा विश्वास का वारिद घना?

काशी, 20 अक्टूबर, 1946

 जीवन

यहीं पर
सब हँसी
सब गान होगा शेष:

यहाँ से
एक जिज्ञासा
अनुत्तर जगेगी अनिमेष!

इलाहाबाद, मई, 1949

पराजय है याद

भोर बेला–नदी तट की घंटियों का नाद।
चोट खा कर जग उठा सोया हुआ अवसाद।
नहीं, मुझ को नहीं अपने दर्द का अभिमान—
मानता हूँ मैं पराजय है तुम्हारी याद।

काशी, 14 नवम्बर, 1946

क्वाँर की बयार

इतराया यह और ज्वार का
क्वाँर की बयार चली,
शशि गगन पार हँसे न हँसे–
शेफ़ाली आँसू ढार चली!
नभ में रवहीन दीन–
बगुलों की डार चली;
मन की सब अनकही रही–
पर मैं बात हार चली!

इलाहाबाद, अक्टूबर, 1948

राह बदलती नहीं

राह बदलती नहीं-प्यार ही सहसा मर जाता है,
संगी बुरे नहीं तुम-यदि नि:संग हमारा नाता है
स्वयंसिद्ध है बिछी हुई यह जीवन की हरियाली-
जब तक हम मत बुझें सोच कर-‘वह पड़ाव आता है!’

रूपनारायणपुर (रेल में), 18 अक्टूबर, 1946

 पावस-प्रात

भोर बेला। सिंची छत से ओस की तिप्-तिप्! पहाड़ी काक
की विजन को पकड़ती-सी क्लान्त बेसुर डाक-
‘हाक्! हाक्! हाक्!’
मत सँजो यह स्निग्ध सपनों का अलस सोना-
रहेगी बस एक मुट्ठी खाक!
‘थाक्! थाक्! थाक्!’

शिलङ्, 12 जुलाई 1947

पुनराविष्कार

कुछ नहीं, यहाँ भी अन्धकार ही है,
काम-रूपिणी वासना का विकार ही है।

यह गुँथीला व्योमग्रासी धुआँ जैसा
आततायी दृप्त-दुर्दम प्यार ही है।

इलाहाबाद, 19 जनवरी, 1949

 

 

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