हरी घास चरनेवाले फिर गाँव में आये हैं-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh 

हरी घास चरनेवाले फिर गाँव में आये हैं-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

 

कुछ मोटे हैं खिले-खिले-से, कुछ मुर्झाये हैं ।
हरी घास चरनेवाले फिर गाँव में आये हैं।
सावधान, मतदेनेवालो! भोले मत बनना,
खतरनाक ये सब चौपाये सींग उठाये हैं ।
भूख-गरीबी का जुमला इनके ओठों पर है,
ये अनशन करने के पहले जमकर खाये हैं ।
महलों के ये मस्त परिन्दे चतुर अहेरी हैं,
गाँव-किसानों की पीड़ा मुँह पर लटकाये हैं ।
इनका स्वार्थ अगर संकट में देश है संकट में,
समीकरण इस तरह सोचकर ये बैठाये हैं ।
राजघाट पर सीस झुकाते गाँधी के आगे,
ये हिंसक नख-दंत फरगकर अपने आये हैं ।
‘लोकतंत्र खतरे में ‘ इनका है प्यारा नारा,
लाज-शरम को बीच सड़क पर बेंच के आये हैं ।
संविधान की खाल खींचकर छतरी बना लिये,
बार – बार जिसकी खिल्ली बेखौफ उड़ाये हैं ।

 

Leave a Reply