हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै-गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै-गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै जिउ त्रिखावंतु बिनु नीर ॥१॥
मेरै मनि प्रेमु लगो हरि तीर ॥
हमरी बेदन हरि प्रभु जानै मेरे मन अंतर की पीर ॥१॥ रहाउ ॥
मेरे हरि प्रीतम की कोई बात सुनावै सो भाई सो मेरा बीर ॥२॥
मिलु मिलु सखी गुण कहु मेरे प्रभ के ले सतिगुर की मति धीर ॥३॥
जन नानक की हरि आस पुजावहु हरि दरसनि सांति सरीर ॥੪॥੬॥छका १॥੮੬੧॥

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