हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥
बातन ही असमानु गिरावहि ॥१॥
ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥
जो प्रभ कीए भगति ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
आपि न देहि चुरू भरि पानी ॥
तिह निंदहि जिह गंगा आनी ॥२॥
बैठत उठत कुटिलता चालहि ॥
आपु गए अउरन हू घालहि ॥३॥
छाडि कुचरचा आन न जानहि ॥
ब्रहमा हू को कहिओ न मानहि ॥४॥
आपु गए अउरन हू खोवहि ॥
आगि लगाइ मंदर मै सोवहि ॥५॥
अवरन हसत आप हहि कांने ॥
तिन कउ देखि कबीर लजाने ॥६॥१॥४४॥332॥

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