हरि की गति नहि कोऊ जानै- शब्द-रागु बिहागड़ा महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

हरि की गति नहि कोऊ जानै- शब्द-रागु बिहागड़ा महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥
जोगी जती तपी पचि हारे अरु बहु लोग सिआने ॥1॥रहाउ॥
छिन महि राउ रंक कउ करई राउ रंक करि डारे ॥
रीते भरे भरे सखनावै यह ता को बिवहारे ॥1॥
अपनी माइआ आपि पसारी आपहि देखनहारा ॥
नाना रूपु धरे बहुरंगी सभ ते रहै निआरा ॥2॥
अगनत अपारु अलख निरंजन जिह सभ जगु भरमाइओ ॥
सगल भरम तजि नानक प्राणी चरनि ताहि चितु लाइओ ॥3॥1॥537॥

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