हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ ॥
गुर परसादी मेरा सहु मिलै वारि वारि हउ जाउ जीउ ॥१॥
मै बनजारनि राम की ॥
तेरा नामु वखरु वापारु जी ॥१॥ रहाउ ॥
कोकिल होवा अम्बि बसा सहजि सबद बीचारु ॥
सहजि सुभाइ मेरा सहु मिलै दरसनि रूपि अपारु ॥२॥
मछुली होवा जलि बसा जीअ जंत सभि सारि ॥
उरवारि पारि मेरा सहु वसै हउ मिलउगी बाह पसारि ॥३॥
नागनि होवा धर वसा सबदु वसै भउ जाइ ॥
नानक सदा सोहागणी जिन जोती जोति समाइ ॥४॥२॥१९॥(157)॥

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